Tuesday, October 23, 2018

एक तोते की कथा, जीवन में गुरु का क्या महत्व होता है पढ़ें??Pramod Krishna Shastri

एक तोते की कथा, जीवन में गुरु का क्या महत्व होता है पढ़ें??

एक पंडित रोज रानी के पास कथा करता था। कथा के अंत में सबको कहता कि ‘राम कहे तो बंधन टूटे’। तभी पिंजरे में बंद तोता बोलता, ‘यूं मत कहो रे पंडित झूठे’। पंडित को क्रोध आता कि ये सब क्या सोचेंगे, रानी क्या सोचेगी। पंडित अपने गुरु के पास गया, गुरु को सब हाल बताया। गुरु तोते के पास गया और पूछा तुम ऐसा क्यों कहते हो?
आज का गुरु मंत्र


तोते ने कहा- ‘मैं पहले खुले आकाश में उड़ता था। एक बार मैं एक आश्रम में जहां सब साधू-संत राम-राम-राम बोल रहे थे, वहां बैठा तो मैंने भी राम-राम बोलना शुरू कर दिया। 
                                        एक दिन मैं उसी आश्रम में राम-राम बोल रहा था, तभी एक संत ने मुझे पकड़ कर पिंजरे में बंद कर लिया, फिर मुझे एक-दो श्लोक सिखाये। आश्रम में एक सेठ ने मुझे संत को कुछ पैसे देकर खरीद लिया। अब सेठ ने मुझे चांदी के पिंजरे में रखा, मेरा बंधन बढ़ता गया। निकलने की कोई संभावना न रही।
         एक दिन उस सेठ ने राजा से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे राजा को गिफ्ट कर दिया, राजा ने खुशी-खुशी मुझे ले लिया, क्योंकि मैं राम-राम बोलता था। रानी धार्मिक प्रवृत्ति की थी तो राजा ने रानी को दे दिया। अब मैं कैसे कहूं कि ‘राम-राम कहे तो बंधन छूटे’।

तोते ने गुरु से कहा आप ही कोई युक्ति बताएं, जिससे मेरा बंधन छूट जाए। गुरु बोले- आज तुम चुपचाप सो जाओ, हिलना भी नहीं। रानी समझेगी मर गया और छोड़ देगी। ऐसा ही हुआ। दूसरे दिन कथा के बाद जब तोता नहीं बोला, तब संत ने आराम की सांस ली। रानी ने सोचा तोता तो गुमसुम पढ़ा है, शायद मर गया। रानी ने पिंजरा खोल दिया, तभी तोता पिंजरे से निकलकर आकाश में उड़ते हुए बोलने लगा ‘सतगुरु मिले तो बंधन छूटे’। अतः शास्त्र कितना भी पढ़ लो, कितना भी जाप कर लो, लेकिन सच्चे गुरु के बिना बंधन नहीं छूटता।

  




 एक बार पढ़ें
असफलता ही सफलता की कुंजी



Next pot...
A Single Mantra Can Resolve All Your Problems 
 
  राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता
 प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज 
श्री धाम वृंदावन मथुरा उत्तर प्रदेश
 8737866555 9453316276


आज शरद पूर्णिमा विशेष महत्व पूरा पढ़े??? पूजन करने से धन की होगी वर्षा Pramod Krishna Shastri

आज शरद पूर्णिमा विशेष महत्व पूरा पढ़े???
पूजन करने से धन की होगी वर्षा

इस बार शरद पूर्णिमा तिथि की शुरुआत आज रात मंगलवार 10/16 को हो रही है और इसका समापन (24) अक्टूबर  बुधवार रात 10/18को होगा। व्रत एवं पूजा (24)अक्टूबर (कल) बुधवार को  ही होगा। व्रती रात्रि में चन्द्रोदय होने के बाद गन्ध,चन्दन,अक्षत,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्य,फल,ताम्बूल दक्षिणादि से पूजन करें

इस मंत्र का जाप करें 21 माला
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यी नमः

 !! चन्द्रार्घ्य निम्न मन्त्र द्वारा करें!!
 🕉ॐक्षीरोदार्णवसम्भूतं अत्रिगोत्रसमुद्भवम्।
गृहाणार्घ्यंशशांकेदं रोहिणी सहितो मम।।
प्रदान कर प्रणाम करे।
🕉 ॐदधिशंखतुशाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनम् सोमं शम्भुर्मुकुट भूषणम्।।
ॐज्योत्सनानां पतये तुभ्यं ज्योतिषां पतये नम:।
नमस्ते रोहिणीकान्त सुधावास नमोस्तु ते।।
मान्‍यता है कि शरद पूर्णिमा ही वो दिन है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्‍त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है। आमतौर पर हम सुनते हैं कि चंद्रमा में सोलह कलाएं होती हैं। भगवान श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं का स्वामी कहा गया है तो राम को बारह कलाओं का। दोनों ही पूर्णावतार हैं। इसकी अलग-अलग व्याख्या मिलती हैं। कुछ की राय में भगवान राम सूर्यवंशी थे तो उनमें बारह कलाएं थीं। श्रीकृष्ण चंद्रवंशी थे तो उनमें सोलह कलाएं थीं।  वर्षभर में शरद पूर्णिमा के ही दिन चांद सोलह कलाओं का होता है। इस रात चांद की छटा अलग ही होती है जो पूरे वर्ष कभी दिखाई नहीं देती। चांद को लेकर जितनी भी उपमाएं दी जाती हैं, वह सभी शरद पूर्णिमा पर केंद्रित हैं।
          🌙चन्द्रमा_की_सोलह_कला:
अमृत, मनदा ( विचार), पुष्प ( सौंदर्य), पुष्टि ( स्वस्थता), तुष्टि( इच्छापूर्ति), ध्रुति ( विद्या), शाशनी ( तेज), चंद्रिका ( शांति),कांति (कीर्ति), ज्योत्सना ( प्रकाश), श्री (धन), प्रीति ( प्रेम),अंगदा (स्थायित्व), पूर्ण ( पूर्णता अर्थात कर्मशीलता) और पूर्णामृत (सुख)। चंद्रमा के प्रकाश की 16 अवस्थाएं हैं। मनुष्य के मन में भी एक प्रकाश है। मन ही चंद्रमा है। चंद्रमा जैसे घटता-बढ़ता रहता है। मन की स्थिति भी यही होती है।इसी पूनम की चांदनी रात्री मे खीर बनाकर प्रात,ग्रहण से चन्द्रमा की अमृतबर्षा रूपी१६कलाओं की प्राप्ति होती है। 
               


     राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता 
    प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज 
            श्री धाम वृंदावन 
    8737866555  9453316276

Friday, October 19, 2018

#पापांकुशा_एकादशी _20-9-2018_दिन_शनिवार का विशेष महत्त्व

  पापांकुशा एकादशी  20-9-2018 दिन शनिवार  हिंदू सनातन धर्म मैं एकादशी का विशेष महत्व है

        धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा हे मधुसूदन कृपया यह बताइए कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? 
            श्री कृष्ण बोले हे राजन आश्विन के शुक्ल पक्ष में पापा कुंशा एकादशी होती है। जो सब पापों का हरण करने वाली तथा उत्तम है। उस दिन संपूर्ण मनोरथ की प्राप्ति के लिए मनुष्य को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले पद्मनाभ संज्ञक मुझ वासुदेव का पूजन करना चाहिए। 
जितेंद्रिय मुनि चिरकाल तक कठोर तपस्या करके इस फल को प्राप्त करता है।
Pramod Krishna Shastri 
               वह उस दिन भगवान गरुड़ध्वज को प्रणाम करने से ही मिल जाता है ।
       पृथ्वी पर जितने तीर्थ और पवित्र देवालय हैं उन सब के सेवन का फल भगवान विष्णु के नाम कीर्तन मात्र से मनुष्य को प्राप्त हो जाता है ।जो सारंग धनुष धारण करने वाले सर्व व्यापक भगवान जनार्दन की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी यमलोक की यात्रा नहीं भोगनी पड़ती ।यदि अन्य कार्य के प्रसंग से भी मनुष्य एकमात्र मात्र एकादशी का उपवास कर ले तो उसे कभी यम यातना नहीं प्राप्त होगी।

          जो पुरुष विष्णु भक्त हो कर शिव की निंदा करता है वह भगवान विष्णु के लोक में स्थान नहीं पाता, इसी प्रकार से यदि कोई शैव या पाशुपत होकर भगवान विष्णु की निंदा करता है,तो वह  रौरव नरक में डालकर तब तक पकाया जाता है जब तक कि 14 इंद्रो की आयु पूरी नहीं हो जाती। यह एकादशी स्वर्ग और मोक्ष को प्रदान करने वाली, शरीर को निरोग बनाने वाली तथा सुंदर स्त्री, धन एवं मित्र देने वाली है। एकादशी को दिन में उपवास करके रात्रि में जागरण करना चाहिए ।जो ऐसा करता है राजेंद्र वह पुरुष मातृ पक्ष की 10 तथा स्त्री पक्ष की भी 10 पीढ़ियों का उद्धार कर देता है ।

      एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य चतुर्भुज पीतांबर धारी होकर भगवान विष्णु के धाम को जाते हैं ।आशविन  शुक्ल पक्ष में पापाकुंशा का व्रत करने मात्र से मानव सब पापों से मुक्त हो श्री हरि लोक में जाता है। जो पुरुष स्वर्ण, भूमि, जल ,जूते और छाते का दान करता है ।वह कभी यमराज को नहीं देखता है।
          गरीब पुरुष को भी चाहिए कि वह यथा शक्ति स्नान, दान, आदि क्रिया करके अपने प्रत्येक दिन को सफल बनावे ।जो होम, स्नान, जप, ध्यान और यज्ञ आदि पुण्य कर्म करने वाले हैं उन्हें भयंकर यम यातना नहीं देखनी पड़ती है।

            लोक में वह मानव दीर्घायु थनाढय,कुलीन और निरोग देखे जाते हैं । इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ ,मनुष्य पाप से दुर्गत में पड़ते हैं और धर्म से स्वर्ग में जाते हैं। राजन तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था उसके अनुसार पापाकुंशा के महत्व का वर्णन कर दिया ।

         "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"     

        प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज                 

            श्री धाम वृंदावन 'मथुरा '       

          8737866555 9453316276

#परमात्मा_एक बार_अवसर_सभी_को_देता_हैं_आप_उसका_सदुपयोग_कर_पाते_हैं_Pramod_Krishna_Shastri

परमात्मा एक बार अवसर सभी को देता  हैं ,आप उसका सदुपयोग कर पाते हैं कि नहीं यह आप पर निर्भर करता है

एक बार एक राजा ने प्रसन्न होकर एक लोहार को अपना चन्दन का बाग भेंट कर दिया , बिचारे लोहार को चंदन के बाग ओर चंदन की किमत पता नही थी अतः वो रोज चंदन की लकड़ी काट काट कर जलाता ओर उसका कोयला बनाकर बेचकर अपनी जीविका चलाने लगा
Pramod Krishna Shastri 
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और इसी तरह पूरा बाग कोयला बनाकर खत्म कर दिया,उधर ऐसे ही राजा घूमते घूमते आये और सोचा कि अब तो लोहार बहुत धनी हो गया होगा पर क्या देखते है कि लोहार तो वैसे का वैसा ही है, राजा को आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो गया  सच जानकर राजा को दुख हुआ और उन्होंने लोहार से पूछा कि पूरा बाग खत्म हो गया कि कुछ चंदन बचा है

 तब लोहार ने एक टुकड़ा जो जलाया नही था वो राजा को दिखाया राजा ने कहा कि जाओ इसे किसी चंदन के व्यापारी के पास ले जाओ और बेच दो ,
लोहार गया और उसे बेचा तो उसे बहुत सारा पैसा मिला लोहार सोचने लगा कि इतना सा टुकड़ा बेचा ओर इतना पैसा मिला पूरे बाग की लकड़ी बेचता तो मेरा जीवन यापन उससे ही हो जाता और वो रोने लगे गया ओर राजा से कहने लगा राजन मुझे एक बाग ओर देदो राजा कहता है कि ऐसा अवसर बार बार नही मिलता....

साधर्मी महानुभावों आपको ये मनुष्य भव उस लोहार को चंदन के बाग जैसा मिला है उसे कोयला बनाओ या चंदन ये आपके हाथ है  जीवन के अंत समय मे जब कुछ पल शेष होते है तब धर्म का रास्ता चुनने का प्रयास करते हो तब ऐसा लगता है कि हे भगवान मुझे थोड़ा जीवन और देदो लेकिन तब ऐसा संभव नही होता....मनुष्य जीवन अनमोल है ऐसा जीवन दुबारा नही मिलेगा...
सारांश... मनुष्य जीवन अनमोल है इसे चंदन बनाओ या कोयला ये आप ही को तय करना है ..

Friday, October 12, 2018

#श्रीमद्भगवद्गीता_का_जीवन_सन्देश

श्रीमद्भगवद्गीता का जीवन-सन्देश (श्लोक ३.१७व१८ का विस्तृत विवेचन -

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः |
 आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||३.१७ ||
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
 न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः || ||३.१८||
#pramod_krishna_shastri_ji_Maharaj 


अन्वय और शब्दार्थ – य: = जो कोई; तु = निश्चय ही; आत्मरति: = आत्मा में ही रमण करनेवाला (क्रियाशील); एव = इस प्रकार (प्रवर्तितचक्र को अपनाकर); स्यात् = हो जाता है; आत्मतृप्त: = आत्मातृप्त है (अर्थात् जिसकी कोई अन्य आकांक्षा नहीं है); च = और; मानवः = मनुष्य; आत्मनि = आत्मा में ही; एव = इस प्रकार; च = और; सन्तुष्ट: = सन्तुष्ट बना रहता है; तस्य = उसके लिये; (अन्य) कार्यम् = कोई कर्म; (श्रेयस की प्राप्ति हेतु) न = नहीं; विद्यते = विद्यमान है | ||३.१७ ||

न = नहीं; एव = इस प्रकार; तस्य = उसका;  कृतेन = किये जाने से; अर्थ: = प्रयोजन; (और) न = नहीं; अकृतेन = न किये जाने से भी; इह = यहाँ; कश्चन = कोई (प्रयोजन); न = नहीं; च = और; अस्य = इसका; सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण प्राणियों में; कश्चित् = कुछ भी; अर्थ व्यपाश्रयः = परस्पर स्वार्थ का सम्बन्ध | ||३.१८||

*अर्थात्* – “इस प्रकार निश्चय ही जो कोई मनुष्य (प्रवर्तित चक्र को अपनाकर) आत्मा में ही रमण करनेवाला (क्रियाशील) हो जाता है और आत्मतृप्त है अर्थात् जिसकी कोई अन्य आकांक्षा नहीं है; और इस प्रकार आत्मा में ही सन्तुष्ट बना रहता है; उसके लिये अन्य कोई कर्म श्रेयस की प्राप्ति हेतु विद्यमान नहीं है |” ||३.१७ ||

“नहीं इस प्रकार उसका किये जाने से प्रयोजन (और) नहीं न किये जाने से भी यहाँ कोई (प्रयोजन); और नहीं इसका सम्पूर्ण प्राणियों में कुछ भी परस्पर स्वार्थ का सम्बन्ध |” ||३.१८||

*भावार्थ/ व्याख्या* - पूर्व श्लोक क्रमांक ३.१६ में सर्वरूप परब्रह्म परमात्मा द्वारा चलाये जा रहे प्रवर्तित चक्र का स्वयं के मनुष्य जीवन में अनुसरण करना आवश्यक बतलाया गया है तथा जो कोई इस प्रवर्तित चक्र को अपने जीवन में अपनाता नहीं है तथा जिसने अपने जीवन में अप्रदाय को अपना लिया है, उसे पापायु कहा जाकर व्यर्थ ही मनुष्य जीवन धारण करनेवाला प्रकट किया गया है | अब सप्तपरिधि रूप में सप्तसोपान आधारित ‘प्रवर्तित चक्र’ की पृष्ठभूमि को अपनाकर - पूर्व श्लोक क्रमांक ३.२ में रथी अर्जुन द्वारा की गयी जिज्ञासा कि “बुद्धि और कर्म (आधारित ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा) इन दोनों में से किसी एक का निश्चय करके कहिये जिससे में ‘श्रेयस’ को प्राप्त हो जाऊं” का समाधान करते हुए सदगुरुदेव केशव श्रीकृष्ण का उपदेश है कि  ‘निश्चय ही इस प्रकार जो कोई मनुष्य इस ‘प्रवर्तित चक्र’ को अपनाकर सर्वरूप आत्मा में ही रमण करनेवाला (क्रियाशील) हो जाता है और आत्मातृप्त है अर्थात् जिसकी उस परमात्मा के चतुर्मुख-चतुर्भुज यज्ञकर्ता रूप को जानकर अन्य कोई आकांक्षा नहीं है; और जो इस प्रकार सर्वरूप आत्मा में ही सन्तुष्ट बना रहता है; उसके लिये ‘श्रेयस’ की प्राप्ति हेतु अन्य कोई कर्म विद्यमान नहीं  है; अर्थात् वह अविनाशी सनातन आत्मा को प्राप्त कर आत्मा में ही रमन करनेवाला है |

इस अवसर पर यह स्मरणीय है कि पूर्व श्लोक २.५५ में ‘स्थितप्रज्ञ’ अवस्था को प्रकट करते हुए यह उपदेश आया है कि– “जिस समय यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं (भोगेच्छाओं) को भलीभांति त्याग देता है, उस समय आत्मा से, आत्मा में ही सन्तुष्ट हुआ पुरुष, प्रज्ञा में स्थित हुआ ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा जाता है’- ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते |’ (गीता २.५५) अब कामनारहित प्रज्ञावान अवस्था में किये जाने वाले ‘यज्ञ कर्म’ को आधार बना कर यह स्पष्ट कथन है कि जिस किसी भी मनुष्य ने ‘प्रवर्तित चक्र’ को अर्थात् इस सप्तसोपनमय सृष्टियज्ञ को अपने जीवन में अपना लिया है तथा जो सृष्टि-यज्ञकर्ता उस परमात्मा के चतुर्मुख – चतुर्भुज जगतरूप को जानकर (अपनाकर) अप्रदाय से रहित हो गया है अर्थात् जिसने अपने सम्पूर्ण कर्म में ‘यज्ञ भाव’ को अपनाकर सर्वगत ब्रह्म को प्राप्त कर (अपना) लिया है; और इस प्रकार जो सर्वरूप अपने आत्मा में ही रमण करनेवाला और सन्तुष्ट (आत्मतुष्ट) बना हुआ है – उसके लिये ‘श्रेयस’ की प्राप्ति हेतु अन्य कोई कर्म विद्यमान नहीं है |

इस अवस्था को प्रकट करते हुए उपनिषद् वाणी में श्रुतिकथन आया है कि – “जो कामना न करनेवाला पुरुष है | जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणों का उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्म को प्राप्त होता है |” – ‘ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति |’ (बृह.उप. ४.४.६) अतः उसके लिये ‘श्रेयस’ की प्राप्ति हेतु अन्य कोई कर्म शेष रहता (विद्यमान) नहीं है |

इस प्रकार जिसने प्रवर्तित चक्र को अपनाकर सर्वगत ब्रह्म के यज्ञरूप को प्राप्त कर लिया है; जो आप्तकाम होकर सर्वरूप आत्मा में ही रमण करनेवाला आत्मकाम बना हुआ है उसके लिये न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है; और न कर्म न करने से ही कोई प्रयोजन शेष रहता है | तथा सम्पूर्ण प्राणियों से भी इसका किञ्चित्मात्र भी निजी स्वार्थ का सम्बन्ध रहता नहीं है | अर्थात् वह अपने सम्पूर्ण कर्म अनासक्त भाव से करता हुआ अपने आत्मा की असंग अवस्था को धारण करनेवाला याकि ‘असंग पुरुष’ को प्राप्त करनेवाला हो जाता है | फिर उसका किसी प्राणी से परस्पर स्वार्थ को कोई सम्बन्ध रहता नहीं है |

इस अवसर पर यह स्मरणीय है यदि हम यहाँ आप्तकाम-आत्मकाम पुरुष का ‘कर्म करने और न करने से कोई प्रयोजन रहता नहीं’ का अर्थ कर्म का पूर्ण परित्याग अपनाते हैं तो यह उचित होता नहीं; कारण कि ‘यज्ञ संहिता’ यजुर्वेद आधारित ईशावास्योपनिषद् में श्रुति जीववपर्यन्त कर्मरत अवस्था को अपनाने का उपदेश करती है- *‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ्समाः |’ (ईशा.-२)

अब आगे यज्ञपुरुष श्रीकृष्ण का उपदेश है

|| ॐ ॥

Monday, October 8, 2018

शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त क्या है जानिए ????Pramod Krishna Shastri ji maharaj

शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त क्या है जानिए ????

प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज १० अक्टूबर २०१८ से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रहे हैं जोकि  १८ अक्टूबर दिन शुक्रवार तक रहेंगे !
हिंदू सनातन धर्म में नवरात्रि कलश स्थापना का विशेष महत्व है !
कलश स्थापना करने से भक्तों की जीवन में एक नई ऊर्जा का प्रवाह होता है कुछ भक्त ९ दिन का व्रत करते हैं कुछ भक्त प्रतिपदा तिथि एवं अष्टमी तिथि का व्रत करने के उपरांत यज्ञ कार्य करते हैं!
नवरात्रि में हर रोज अलग-अलग नवदुर्गा देवियों का भक्त पूजन करते हैं!

श्री नव दुर्गा मां










कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त प्रातः काल ६ बज कर २५ मिनट से प्रारंभ होगा जोकि ७ बज कर बजे कर ३६ मिनट तक रहेगा !

शुभ मुहूर्त की अवधि लगभग १ घंटा ११ मिनट है !


९ अक्टूबर दिन मंगलवार ९:२० मिनट से प्रतिपदा तिथि का आगमन हो जाएगा प्रतिपदा तिथि बुधवार १० अक्टूबर को ७ बजकर 36 मिनट तक रहेगी

कोई भक्त अगर किसी कारणवश ६ बज करके २५ मिनट से ७ बज करके ३६ मिनट के बीच के दौरान अगर कलश स्थापना नहीं कर पता है 

तो वह भक्त अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापन कर सकता है 

अभिजीत मुहूर्त १० अक्टूबर दिन के ११:०० बचकर ३३ मिनट से १२:२६ तक रहेगी जिसमें सभी भक्त कलश विराजमान कर सकते हैं !
सभी भक्त एक बात का विशेष ध्यान रखें शास्त्रों के अनुसार अमस्या युक्त शुक्ल प्रतिपदा मुहूर्त में कलश स्थापन वर्जित है ९ अक्टूबर को कलश स्थापना भूलकर भी ना करें !
जय दुर्गा मां



          "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"     

          प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज       

        श्री धाम वृंदावन मथुरा उत्तर प्रदेश  www.pramodkrishnashastri.com   संपर्क सूत्र 873786655 ,9453316276

Saturday, October 6, 2018

असफलता ही सफलता की कुंजी है !!Pramod Krishna Shastri

असफलता ही सफलता की कुंजी है !!

प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज अपने जीवन में जो अनुभव किया उसको आप लोगों तक पहुंचाने का प्रयास मित्रों अगर आपने

कोशिश किए बिना हार मान ली तो आप हारने से पहले ही हार गए !

Pramod Krishna Shastri ji Maharaj 


कोशिश अवश्य करनी चाहिए कोशिश करने वालों की ही जीत होती है




लहरों की डर से कभी नौका पार नहीं होती !     कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती !!


    अगर आप कोशिश करते हैं और सफलता नहीं मिलती तो परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि असफलता ही सफलता की कुंजी है !
 विज्ञान के क्षेत्र में महान साइंटिस्ट थॉमस अल्वा एडिसन जिन्होंने बल्ब का आविष्कार किया और घर घर रोशनी पहुंचाई
एडिशन जी ने बताया कि जब मैं बल्ब का निर्माण कर रहा था तो मैं लगभग 1000 बार असफल हुआ मित्रों अगर में पहली बार में ही हार मान लेता और अपने काम को अधूरा छोड़ देता तो आज बल्ब का निर्माण नहीं होता मैंने बार-बार प्रयास किया जितनी बार असफल हुआ उतना ही ज्यादा प्रयास किया!
अंततः एक दिन मैंने बल्ब का निर्माण कर ही लिया एडिशन कहते हैं मैं जितनी बार असफल हुआ मुझे उतना ही ज्यादा अनुभव हुआ और अंत में मैं सफल हो गया !

मित्रों अगर हम कोशिश करते हैं और हार जाते हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि भले ही हमारी जीत ना हुई हो लेकिन मुझे अनुभव अवश्य हो गया और वह अनुभव दोबारा मुझे उसी कार्य में सफलता प्रदान करेगा

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श्री रामचरितमानस की ये एक चौपाई मिटा देगी   सारे संकट, घर में होगी खुशियों की बरसात ! http://www.pramodkrishnashastri.com/2018/10/108-21-www.html?m=1

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