।। श्लोक ।।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। अत: तू फल की इच्छा किए बिना कर्म किए जा। तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
इसका अर्थ है कि मनुष्य को भविष्य की चिंता किए बिना वर्तमान में रहते हुए सिर्फ अपने काम पर फोकस करना चाहिए। अगर हम वर्तमान में मेहनत और लगन से काम करेंगे तो भविष्य में उसका सुफल ही प्राप्त होगा।
।। श्लोक ।।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
भावार्थ: ऐसा मनुष्य जो न कभी अति हर्षित होता है, न द्वेष करता है और न शोक करता है। और जो न कामना करता है तथा शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है। वह भक्तियुक्त मनुष्य मुझे अतिप्रिय है।
इसका अर्थ कोई अति विशिष्ट कार्य बन जाने पर हमें अति हर्षित होने से बचना चाहिए। ऐसा करने से गलती होने की आशंका बढ़ जाती है। हमें किसी दूसरे से जलन भी नहीं करनी चाहिए।
।। श्लोक ।।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥