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Friday, October 12, 2018

#श्रीमद्भगवद्गीता_का_जीवन_सन्देश

श्रीमद्भगवद्गीता का जीवन-सन्देश (श्लोक ३.१७व१८ का विस्तृत विवेचन -

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः |
 आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||३.१७ ||
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
 न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः || ||३.१८||
#pramod_krishna_shastri_ji_Maharaj 


अन्वय और शब्दार्थ – य: = जो कोई; तु = निश्चय ही; आत्मरति: = आत्मा में ही रमण करनेवाला (क्रियाशील); एव = इस प्रकार (प्रवर्तितचक्र को अपनाकर); स्यात् = हो जाता है; आत्मतृप्त: = आत्मातृप्त है (अर्थात् जिसकी कोई अन्य आकांक्षा नहीं है); च = और; मानवः = मनुष्य; आत्मनि = आत्मा में ही; एव = इस प्रकार; च = और; सन्तुष्ट: = सन्तुष्ट बना रहता है; तस्य = उसके लिये; (अन्य) कार्यम् = कोई कर्म; (श्रेयस की प्राप्ति हेतु) न = नहीं; विद्यते = विद्यमान है | ||३.१७ ||

न = नहीं; एव = इस प्रकार; तस्य = उसका;  कृतेन = किये जाने से; अर्थ: = प्रयोजन; (और) न = नहीं; अकृतेन = न किये जाने से भी; इह = यहाँ; कश्चन = कोई (प्रयोजन); न = नहीं; च = और; अस्य = इसका; सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण प्राणियों में; कश्चित् = कुछ भी; अर्थ व्यपाश्रयः = परस्पर स्वार्थ का सम्बन्ध | ||३.१८||

*अर्थात्* – “इस प्रकार निश्चय ही जो कोई मनुष्य (प्रवर्तित चक्र को अपनाकर) आत्मा में ही रमण करनेवाला (क्रियाशील) हो जाता है और आत्मतृप्त है अर्थात् जिसकी कोई अन्य आकांक्षा नहीं है; और इस प्रकार आत्मा में ही सन्तुष्ट बना रहता है; उसके लिये अन्य कोई कर्म श्रेयस की प्राप्ति हेतु विद्यमान नहीं है |” ||३.१७ ||

“नहीं इस प्रकार उसका किये जाने से प्रयोजन (और) नहीं न किये जाने से भी यहाँ कोई (प्रयोजन); और नहीं इसका सम्पूर्ण प्राणियों में कुछ भी परस्पर स्वार्थ का सम्बन्ध |” ||३.१८||

*भावार्थ/ व्याख्या* - पूर्व श्लोक क्रमांक ३.१६ में सर्वरूप परब्रह्म परमात्मा द्वारा चलाये जा रहे प्रवर्तित चक्र का स्वयं के मनुष्य जीवन में अनुसरण करना आवश्यक बतलाया गया है तथा जो कोई इस प्रवर्तित चक्र को अपने जीवन में अपनाता नहीं है तथा जिसने अपने जीवन में अप्रदाय को अपना लिया है, उसे पापायु कहा जाकर व्यर्थ ही मनुष्य जीवन धारण करनेवाला प्रकट किया गया है | अब सप्तपरिधि रूप में सप्तसोपान आधारित ‘प्रवर्तित चक्र’ की पृष्ठभूमि को अपनाकर - पूर्व श्लोक क्रमांक ३.२ में रथी अर्जुन द्वारा की गयी जिज्ञासा कि “बुद्धि और कर्म (आधारित ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा) इन दोनों में से किसी एक का निश्चय करके कहिये जिससे में ‘श्रेयस’ को प्राप्त हो जाऊं” का समाधान करते हुए सदगुरुदेव केशव श्रीकृष्ण का उपदेश है कि  ‘निश्चय ही इस प्रकार जो कोई मनुष्य इस ‘प्रवर्तित चक्र’ को अपनाकर सर्वरूप आत्मा में ही रमण करनेवाला (क्रियाशील) हो जाता है और आत्मातृप्त है अर्थात् जिसकी उस परमात्मा के चतुर्मुख-चतुर्भुज यज्ञकर्ता रूप को जानकर अन्य कोई आकांक्षा नहीं है; और जो इस प्रकार सर्वरूप आत्मा में ही सन्तुष्ट बना रहता है; उसके लिये ‘श्रेयस’ की प्राप्ति हेतु अन्य कोई कर्म विद्यमान नहीं  है; अर्थात् वह अविनाशी सनातन आत्मा को प्राप्त कर आत्मा में ही रमन करनेवाला है |

इस अवसर पर यह स्मरणीय है कि पूर्व श्लोक २.५५ में ‘स्थितप्रज्ञ’ अवस्था को प्रकट करते हुए यह उपदेश आया है कि– “जिस समय यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं (भोगेच्छाओं) को भलीभांति त्याग देता है, उस समय आत्मा से, आत्मा में ही सन्तुष्ट हुआ पुरुष, प्रज्ञा में स्थित हुआ ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा जाता है’- ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते |’ (गीता २.५५) अब कामनारहित प्रज्ञावान अवस्था में किये जाने वाले ‘यज्ञ कर्म’ को आधार बना कर यह स्पष्ट कथन है कि जिस किसी भी मनुष्य ने ‘प्रवर्तित चक्र’ को अर्थात् इस सप्तसोपनमय सृष्टियज्ञ को अपने जीवन में अपना लिया है तथा जो सृष्टि-यज्ञकर्ता उस परमात्मा के चतुर्मुख – चतुर्भुज जगतरूप को जानकर (अपनाकर) अप्रदाय से रहित हो गया है अर्थात् जिसने अपने सम्पूर्ण कर्म में ‘यज्ञ भाव’ को अपनाकर सर्वगत ब्रह्म को प्राप्त कर (अपना) लिया है; और इस प्रकार जो सर्वरूप अपने आत्मा में ही रमण करनेवाला और सन्तुष्ट (आत्मतुष्ट) बना हुआ है – उसके लिये ‘श्रेयस’ की प्राप्ति हेतु अन्य कोई कर्म विद्यमान नहीं है |

इस अवस्था को प्रकट करते हुए उपनिषद् वाणी में श्रुतिकथन आया है कि – “जो कामना न करनेवाला पुरुष है | जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणों का उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्म को प्राप्त होता है |” – ‘ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति |’ (बृह.उप. ४.४.६) अतः उसके लिये ‘श्रेयस’ की प्राप्ति हेतु अन्य कोई कर्म शेष रहता (विद्यमान) नहीं है |

इस प्रकार जिसने प्रवर्तित चक्र को अपनाकर सर्वगत ब्रह्म के यज्ञरूप को प्राप्त कर लिया है; जो आप्तकाम होकर सर्वरूप आत्मा में ही रमण करनेवाला आत्मकाम बना हुआ है उसके लिये न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है; और न कर्म न करने से ही कोई प्रयोजन शेष रहता है | तथा सम्पूर्ण प्राणियों से भी इसका किञ्चित्मात्र भी निजी स्वार्थ का सम्बन्ध रहता नहीं है | अर्थात् वह अपने सम्पूर्ण कर्म अनासक्त भाव से करता हुआ अपने आत्मा की असंग अवस्था को धारण करनेवाला याकि ‘असंग पुरुष’ को प्राप्त करनेवाला हो जाता है | फिर उसका किसी प्राणी से परस्पर स्वार्थ को कोई सम्बन्ध रहता नहीं है |

इस अवसर पर यह स्मरणीय है यदि हम यहाँ आप्तकाम-आत्मकाम पुरुष का ‘कर्म करने और न करने से कोई प्रयोजन रहता नहीं’ का अर्थ कर्म का पूर्ण परित्याग अपनाते हैं तो यह उचित होता नहीं; कारण कि ‘यज्ञ संहिता’ यजुर्वेद आधारित ईशावास्योपनिषद् में श्रुति जीववपर्यन्त कर्मरत अवस्था को अपनाने का उपदेश करती है- *‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ्समाः |’ (ईशा.-२)

अब आगे यज्ञपुरुष श्रीकृष्ण का उपदेश है

|| ॐ ॥

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