Tuesday, January 21, 2020

21000 पार्थिव शिवलिंगों का महारुद्राभिषेक 2020

श्री राधाकृष्ण गौ सेवा संस्थान
                एवं
      शिव महासभा के 

         तत्वाधान में
             महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर 

21000 पार्थिव शिवलिंग ओं का महारुद्राभिषेक          दिनांक 21 फरवरी दिन शुक्रवार 2020 

     

महारुद्राभिषेक 2020
Pramod Krishna Shastri
8737866555 9453316276


कार्यक्रम स्थल ÷बाबा की बगिया न्यू टैक्सी स्टैंड                                राजाजीपुरम 'लखनऊ'



         कार्यक्रम व्यवस्थापक
    राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता
   प्रमोद कृष्णा शास्त्री जी महाराज
             8737866555

Monday, January 20, 2020

अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।

वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।

वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।

उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।

दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?

बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही  है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,.... बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय ----समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ ----अहंकारी मन है।
 और
मालिक---- ईश्वर का प्रतीक है।
कीचड़---- यह संसार है।
 और
यह संघर्ष---- अस्तित्व की लड़ाई है।

किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।
 
ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है

Saturday, January 18, 2020

शिवरात्रि के पावन पर्व पर महारुद्राभिषेक 2020

   रुद्राभिषेक का विशेष महत्व

रुद्र अर्थात भूतभावन शिव का अभिषेक। शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही 'रुद्र' कहा जाता है, क्योंकि रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानी भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं।


हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारी कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रुद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका अर्थात सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा हैं। हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिए तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक किया जाता है।
महारुद्राभिषेक सन् 2020
प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
Call 8737866555

परंतु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों में मंत्र, गोदुग्ध या अन्य दूध मिलाकर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सबको मिलाकर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है किंतु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाए तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है। रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। 

वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। पुराणों में तो इससे संबंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है। वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में कहा गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काटकर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया।

भस्मासुर ने शिवलिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओं से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया। कालसर्प योग, गृहक्लेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यों की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।

ज्योतिर्लिंग क्षेत्र एवं तीर्थस्थान तथा शिवरात्रि प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वों में शिववास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। अत: हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं।

स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है कि जब हम अभिषेक करते हैं तो स्वयं महादेव साक्षात उस अभिषेक को ग्रहण करते हैं। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नहीं है, जो हमें रुद्राभिषेक करने या करवाने से प्राप्त नहीं हो सकता है।





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Saturday, August 31, 2019

अहंकार और समर्पण क्या अंतर है पूरा पढ़ें

सर्मपण और अहंकार सुंदर प्रसंग

            एक बार जरूर पढ़े।

       पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर लटक रहा  नारियल रोज नीचे नदी मेँ पड़े पत्थर पर हंसता और कहता।
     " तुम्हारी तकदीर मेँ भी बस एक जगह पड़े रह कर, नदी की धाराओँ के प्रवाह को सहन करना ही लिखा है, देखना एक दिन यूं ही पड़े पड़े घिस जाओगे।

Pramod Krishna Shastri
Call 8737866555

      मुझे देखो कैसी #शान से उपर बैठा हूं?  #पत्थर रोज उसकी #अहंकार भरी बातोँ को अनसुना कर देता।       #समय बीता एक दिन वही पत्थर घिस घिस कर गोल हो गया और  #विष्णु प्रतीक शालिग्राम के रूप मेँ जाकर, एक मन्दिर मेँ प्रतिष्ठित हो गया ।     एक दिन वही नारियल उन #शालिग्राम जी की पूजन सामग्री के रूप मेँ मन्दिर  मेँ लाया गया।     शालिग्राम ने नारियल को पहचानते हुए कहा " भाई . देखो घिस घिस कर परिष्कृत होने वाले ही प्रभु के प्रताप से, इस स्थिति को पहुँचते हैँ।     सबके आदर का पात्र भी बनते है,  जबकि #अहंकार के मतवाले अपने ही दभं के डसने से नीचे आ गिरते हैँ।     तुम जो कल आसमान मे थे, आज से मेरे आगे टूट कर, कल से सड़ने भी लगोगे, पर मेरा अस्तित्व अब कायम रहेगा।    भगवान की द्रष्टि मेँ मूल्य.. समर्पण का है . #अहंकार का नहीं।

Sunday, August 25, 2019

पथ प्रदर्शक श्रीमद्भागवद गीता उपदेश एक बार अवश्य पढ़ें

   
                     ।। श्लोक ।।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥


भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। अत: तू फल की इच्‍छा किए बिना कर्म किए जा। तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
इसका अर्थ है कि मनुष्‍य को भविष्‍य की चिंता किए बिना वर्तमान में रहते हुए सिर्फ अपने काम पर फोकस करना चाहिए। अगर हम वर्तमान में मेहनत और लगन से काम करेंगे तो भविष्‍य में उसका सुफल ही प्राप्‍त होगा।


               ।। श्लोक ।।


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥


भावार्थ: ऐसा मनुष्‍य जो न कभी अति हर्षित होता है, न द्वेष करता है और न शोक करता है। और जो न कामना करता है तथा शुभ और अशुभ सम्‍पूर्ण कर्मों का त्‍यागी है। वह भक्तियुक्‍त मनुष्‍य मुझे अतिप्रिय है।
इसका अर्थ कोई अति विशिष्‍ट कार्य बन जाने पर हमें अति हर्षित होने से बचना चाहिए। ऐसा करने से गलती होने की आशंका बढ़ जाती है। हमें किसी दूसरे से जलन भी नहीं करनी चाहिए।
        


                        ।। श्लोक ।।


कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। 
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥


भावार्थ: जो मंद बुद्धि मनुष्‍य समस्‍त इंन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोकता है। मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्‍याचारी अर्थात दंभी कहा जाता है।
इसका अर्थ है कि ऐसा व्‍यक्ति जो अपनी इंद्रियों पर केवल ऊपर से नियंत्रण करने का दिखावा करता है और अंदर से उसका मन चलायमान रहता है, ऐसा व्‍यक्ति झूठा और कपटी कहलाता है।



Friday, August 23, 2019

कृष्ण जन्माष्टमी 2019 भए प्रगट कृपाला

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी॥
  • भए प्रगट कृपाला – कृपालु प्रभु प्रकट हुए
  • दीनदयाला – दीनों पर दयाकरने वाले
  • कौसल्या हितकारी – कौसल्याजी के हितकारी
  • हरषित महतारी – माता हर्ष से भर गई
  • मुनि मन हारी – मुनियों के मन को हरने वाले
  • अद्भुत रूप बिचारी – उनके अद्भुत रूप का विचार करके
जब कृपा के सागर, कौशल्या के हितकारी, दीनदयालु प्रभु प्रकट हुए, तब उनका अद्भुत स्वरुप देखकर माता कौशल्या परम प्रसन्न हुई।
जिन की शोभा को देखकर मुनि लोगों के मन मोहित हो जाते हैं, उस स्वरूप का दर्शन कर माता हर्ष से भर गई।
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लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी॥
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Pramod Krishna Shastri call 8737866555



  • लोचन अभिरामा – नेत्रों को आनंद देने वाले
  • तनु घनस्यामा – मेघ के समान श्याम शरीर
  • निज आयुध भुजचारी – चारों भुजाओं में शस्त्र (आयुध) धारण किए हुए थे
  • भूषन – दिव्य आभूषण और
  • बनमाला – वनमाला पहने हुए थे,
  • नयन बिसाला – बड़े-बड़े नेत्र थे,
  • सोभासिंधु – इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा
  • खरारी – खर राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए।
कैसा है यह स्वरूप, तुलसीदासजी कहते हैं कि सुंदर नेत्र है, मेघसा श्याम शरीर है, चारों भुजाओं में अपने चारों शस्त्र (शंख, चक्र, गदा, पद्म) धरे है।
वनमाला पहने हैं, सब अंगों में आभूषण सजे है, बड़े विशाल नेत्र है, शोभा के सागर और खर नाम राक्षस के बैरी है।
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कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता॥
  • कह दुइ कर जोरी – दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी
  • अस्तुति तोरी – तुम्हारी स्तुति
  • केहि बिधि करूं – मैं किस प्रकार करूँ
  • अनंता – हे अनंत!
  • माया गुन ग्यानातीत अमाना – माया, गुण और ज्ञान से परे
  • वेद पुरान भनंता – वेद और पुराण तुम को बतलाते हैं (वेद और पुराण तुम को माया, गुण और ज्ञान से परे बतलाते हैं)
दोनों हाथ जोड़ कौशल्या ने कहा कि हे अनंत प्रभु, मैं आप की स्तुति कैसे करू।
क्योंकि वेद और पुराण भी ऐसे कहते हैं कि प्रभु का स्वरूप माया के गुणों से परे, इंद्रियजन्य ज्ञान से अगोचर और प्रमाण का विषय नहीं है।
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करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता॥
  • करुना सुख सागर – दया और सुख का समुद्र,
  • सब गुन आगर – सब गुणों का धाम कहकर
  • जेहि गावहिं श्रुति संता – श्रुतियाँ और संतजन जिनका गान करते हैं
  • सो मम हित लागी – मेरे कल्याण के लिए
  • जन अनुरागी – वही भक्तों पर प्रेम करने वाले
  • भयउ प्रगट श्रीकंता – लक्ष्मीपति भगवान प्रकट हुए हैं
सो हे प्रभु मैं तो ऐसे जानती हूँ कि जिसे श्रुति और संत लोग गाते हैं, वे करुणा व सुखके सागर, सब गुणों के आगर (भण्डार), भक्त अनुरागी, लक्ष्मीपति, प्रभु मेरा हित करने के लिए प्रकट हुए है।
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ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै॥
  • ब्रह्मांड निकाया – अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह हैं
  • निर्मित माया – माया के रचे हुए
  • रोम रोम – आपके रोम-रोम में रहते हैं
  • प्रति बेद कहै – ऐसा वेद कहते हैं
  • मम उर सो बासी – वे तुम मेरे गर्भ में रहे
  • यह उपहासी – इस हँसी की बात
  • सुनत धीर – सुनने पर धीर (विवेकी) पुरुषों की बुद्धि भी
  • मति थिर न रहै – स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)
और हे प्रभु, वेद ऐसे कहते हैं कि आपके रोम-रोम में माया से रचे हुए अनेक ब्रह्मांड समूह रहते हैं सो वे आप मेरे उदर (गर्भ) में कैसे रहे। इस बात की मुझे बड़ी हंसी आती है।
केवल मैं ही नहीं बड़े-बड़े धीर पुरुषों की बुद्धि भी यह बात सुनकर धीर नहीं रहती।
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उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥
  • उपजा जब ग्याना – जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ
  • प्रभु मुसुकाना – तब प्रभु मुस्कुराए
  • चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै – वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं
  • कहि कथा सुहाई – अतः उन्होंने (पूर्व जन्म की) सुंदर कथा कहकर
  • मातु बुझाई – माता को समझाया
  • जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै – जिससे उन्हें पुत्र का प्रेम प्राप्त हो और भगवान के प्रति पुत्र का भाव आ जाए
जब कौशल्या को ज्ञान प्राप्त हो गया तब प्रभु हँसे कि देखो इसको किस वक्त में ज्ञान प्राप्त हुआ है अभी इसको ज्ञान नहीं होना चाहिए। क्योंकि, अभी मुझको बहुत चरित्र करने हैं।
उस वक्त प्रभु अनेक प्रकार के चरित्र करना चाहते थे, इसलिए माता को अनेक प्रकार की कथा सुना कर ऐसे समझा बुझा दिया कि जिस तरह उसके मन में पुत्र का प्रेम आ गया।
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माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा॥
  • माता पुनि बोली, सो मति डोली– प्रभु की प्रेरणा से कौशल्या माँ की बुद्धि दूसरी ओर डोल गई, तब वह फिर बोली
  • तजहु तात यह रूपा – हे तात! यह रूप छोड़कर
  • कीजै सिसुलीला – बाललीला करो
  • अति प्रियसीला – जो मेरे लिए अत्यन्त प्रिय है
  • यह सुख परम अनूपा – यह सुख मेरे लिए परम अनुपम होगा
प्रभु की प्रेरणा से कौशल्या की बुद्धि दूसरी ओर डोल गई जिससे वह फिर बोली कि हे तात! आप यह स्वरूप तज (छोड़) दो।
बालक स्वरूप धारण कर, अतिशय प्रिय स्वभाव वाली बाल लीला करो। यह सुख मुझको बहुत अच्छा लगता है।
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सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा॥
  • सुनि बचन सुजाना – माता के ऐसे वचन सुनकर
  • रोदन ठाना – (भगवान ने बालक रूप धारण कर) रोना शुरू कर दिया
  • होइ बालक – बालक रूप धारण कर
  • सुरभूपा – देवताओं के स्वामी भगवान ने
  • यह चरित जे गावहिं – जो इस चरित्र का गान करते हैं
  • हरिपद पावहिं – वे श्री हरि का पद (भगवत पद) पाते हैं
  • ते न परहिं – और वे फिर नहीं गिरते
  • भवकूपा – संसार रूपी कुएं में (और फिर संसार रूपी माया में नहीं गिरते)
माता के ऐसे वचन सुन प्रभु ने बालक स्वरूप धारण कर रुदन करना (रोना) शुरू किया।

महादेव जी कहते हैं कि हे पार्वती जो मनुष्य इस चरित्र को गाते हैंवह मनुष्य अवश्य भगवत पदको प्राप्त हो जाते हैं और वे कभी संसार रुपी कुए में नहीं गिरते।

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता॥

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै॥

उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥

माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा॥

सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा॥

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी॥

Thursday, July 25, 2019

Pramod Krishna shastri Bhagwat katha

  जिस दिन आप का विचार हो जाएगा
कि भगवान के बिना मैं रह नहीं सकता,

Pramod Krishna Shastri
Call 8737866555

एक मच्छर गरुड़जी से मिलना चाहे और गरुड़ जी मच्छर से मिलना चाहे तो मच्छर से मिलने में गरुड़ की ताकत काम करेगी और वे यहीं उसे मिल जाएंगे। मच्छर में उड़ने की कितनी ताकत है ?  

  इसी तरह भगवान से मिलने की इच्छा हो तो आप से मिलने में भगवान की ताकत काम करेगी आपकी ताकत काम नहीं करेगी

आप विचार करो, आप भगवान के पास नहीं पहुंच सकते तो क्या भगवान भी आपके पास नहीं पहुंच सकते??
 वे तो आपके हृदय में विराजमान हैं।  भगवान को आप दूर मानते हो इसलिए भगवान दूर होते हैं। आप मानोगे कि भगवान मेरे को नहीं मिलेंगे तो वह नहीं मिलेंगे।

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