Thursday, May 9, 2019

Bhakt aur Bhgwan katha

  ।। सदना कसाई की कथा ।।

काशी में एक ब्राह्मण के सामने से एक गाय भागती हुई किसी गली में घुस गई। तभी वहां एक आदमी आया उसने गाय के बारे में पूछा -

पंडितजी माला फेर रहे थे इसलिए कुछ बोला नहीं बस हाथ से उस गली का इशारा कर दिया जिधर गाय गई थी ।

पंडितजी इस बात से अंजान थे कि वह आदमी कसाई है, और गौमाता उसके चंगुल से जान बचाकर भागी थीं। कसाई ने पकड़कर गोवध कर दिया।
अंजाने में हुए इस घोर पाप के कारण पंडितजी अगले जन्म में कसाई घर में जन्मे नाम पड़ा, सदना।पर पूर्वजन्म के पुण्यकर्मो के कारण कसाई होकर भी वह उदार और सदाचारी थे।
कसाई परिवार में जन्मे होने के कारण सदना मांस बेचते तो थे, परन्तु भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी एक दिन सदना को नदी के किनारे एक पत्थर पड़ा मिला।
पत्थर अच्छा लगा इसलिए वह उसे मांस तोलने के लिए अपने साथ ले आए।वह इस बात से अंजान थे कि यह वही शालिग्राम थे जिन्हें पूर्वजन्म नित्य पूजते थे ।
सदना कसाई पूर्वजन्म के शालिग्राम को इस जन्म में मांस तोलने के लिए बाँट ( तोल) के रूप में प्रयोग करने लगे।आदत के अनुसार सदना ठाकुरजी के भजन गाते रहते थे।
ठाकुरजी भक्त की स्तुति का पलड़े में झूलते हुए आनंद लेते रहते।बाँट का कमाल ऐसा था कि चाहे आधा किलो तोलना हो, एक किलो या दो किलो सारा वजन उससे पक्का हो जाता।
एक दिन सदना की दुकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले, उनकी नजर बाँट पर पड़ी तो सदना के पास आए और शालिग्राम को अपवित्र करने के लिए फटकारा।
उन्होंने कहा- मूर्ख, जिसे पत्थर समझकर मांस तौल रहे हो वे शालिग्राम भगवान हैं। ब्राह्मण ने सदना से शालिग्राम भगवान को लिया और घर ले आए।
गंगा जल से नहलाया, धूप, दीप,चन्दन से पूजा की। ब्राह्मण को अहंकार हो गया जिस शालिग्राम से पतितों का उद्दार होता है आज एक शालिग्राम का वह उद्धार कर रहा है।
रात को उसके सपने में ठाकुरजी आए और बोले- तुम जहां से लाए हो वहीँ मुझे छोड़ आओ, मेरे भक्त सदन कसाई की भक्ति में जो बात है वह तुम्हारे आडंबर में नहीं।
ब्राह्मण बोला- प्रभु! सदना कसाई का पापकर्म करता है, आपका प्रयोग मांस तोलने में करता है। मांस की दुकान जैसा अपवित्र स्थान आपके योग्य नहीं
भगवान बोले- भक्ति में भरकर सदना मुझे तराजू में रखकर तोलता था मुझे ऐसा लगता है कि वह मुझे झूला रहा हो। मांस की दुकान में आने वालों को भी मेरे नाम का स्मरण कराता है।
मेरा भजन करता है, जो आनन्द वहां मिलता था वह यहां नहीं, तुम मुझे वही छोड आओ। ब्राह्मण शालिग्राम भगवान को वापस सदना कसाई को दे आए।
ब्राह्मण बोला- भगवान को तुम्हारी संगति ही ज्यादा सुहाई। यह तो तुम्हारे पास ही रहना चाहते हैं। ये शालिग्राम भगवान का स्वरुप हैं, हो सके तो इन्हें पूजना बाट मत बनाना।
सदना ने यह सुना अनजाने में हुए अपराध को याद करके दुखी हो गया। सदना ने प्राश्चित का निश्चय किया और भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए निकल पड़ा।
वह भी भगवान के दर्शन को जाते एक समूह में शामिल हो गए लेकिन लोगों को पूछने पर उसने बता दिया कि वह कसाई का काम करता था।
लोग उससे दूर-दूर रहने लगे। उसका छुआ खाते-पीते नहीं थे। दुखी सदना ने उनका साथ छोड़ा और शालिग्रामजी के साथ भजन करता अकेले चलने लगा।
सदना को प्यास लगी थी,रास्ते में एक गांव में कुंआ दिखा तो वह पानी पीने ठहर गया। वहां एक सुन्दर स्त्री पानी भर रही थी।वह सदना के सुंदर मजबूत शरीर पर रीझ गई।
उसने सदना से कहा कि शाम हो गई है, इसलिए आज रात वह उसके घर में ही विश्राम कर लें,सदना को उसकी कुटिलता समझ में न आई, वह उसके अतिथि बन गए,
रात में वह स्त्री अपने पति के सो जाने पर सदना के पास पहुंच गई और उनसे अपने प्रेम की बात कही, स्त्री की बात सुनकर सदना चौंक गए और उसे पतिव्रता रहने को कहा।
स्त्री को लगा कि शायद पति होने के कारण सदना रुचि नहीं ले रहे, वह चली गई और सोते हुए पति का गला काट लाई।
सदना भयभीत हो गए,स्त्री समझ गई कि बात बिगड़ जाएगी इसलिए उसने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया। पड़ोसियों से कह दिया कि इस यात्री को घर में जगह दी थी चोरी की नीयत से इसने मेरे पति का गला काट दिया,
सदना को पकड़ कर न्यायाधीश के सामने पेश किया गया। न्यायाधीश ने सदना को देखा तो ताड़ गए कि यह हत्यारा नहीं हो सकता। उन्होने बार-बार सदना से सारी बात पूछी।
सदना को लगता था कि यदि वह प्यास से व्याकुल गांव में न पहुंचते तो हत्या न होती।वह स्वयं को ही इसके लिए दोषी मानते थे, अतः वे मौन ही रहे।
न्यायाधीश ने राजा को बताया कि एक आदमी अपराधी है नहीं पर चुप रहकर एक तरह से अपराध की मौन स्वीकृति दे रहा है। इसे क्या दंड दिया जाना चाहिए?
राजा ने कहा- यदि वह प्रतिवाद नहीं करता तो दण्ड अनिवार्य है, अन्यथा प्रजा में गलत सन्देश जाएगा कि अपराधी को दंड नहीं मिला।इसे मृत्युदंड मत दो, हाथ काटने का
हुक्म दो।
सदना का दायां हाथ काट दिया गया, सदना ने अपने पूर्वजन्म के कर्म मानकर चुपचाप दंड सहा और जगन्नाथपुरी धाम की यात्रा शुरू की।
धाम के निकट पहुंचे तो भगवान ने अपने सेवक राजा को प्रियभक्त सदना कसाई की सम्मान से अगवानी का आदेश दिया। प्रभु आज्ञा से राजा गाजे-बाजे लेकर अगुवानी को आया।
सदना ने यह सम्मान स्वीकार नहीं किया तो स्वयं ठाकुरजी ने दर्शन दिए। उन्हें सारी बात सुनाई- तुम पूर्वजन्म में ब्राहमण थे, तुमने संकेत से एक कसाई को गाय का पता बताया था।
तुम्हारे कारण जिस गाय की जान गई थी वही स्त्री बनी है जिसके झूठे आरोपों से तुम्हारा हाथ काटा गया। उस स्त्री का पति पूर्वजन्म का कसाई बना था जिसका वध कर गाय ने बदला लिया है।

भगवान जगन्नाथजी बोले- सभी के शुभ और अशुभ कर्मों का फल मैं देता हूँ ।अब तुम निष्पाप हो गए हो।घृणित आजीविका के बावजूद भी तुमने धर्म का साथ न छोड़ा

इसलिए तुम्हारे प्रेम को मैंने स्वीकार किया।
मैं तुम्हारे साथ मांस तोलने वाले तराजू में भी प्रसन्न रहा।भगवान के दर्शन से सदनाजी को मोक्ष प्राप्त हुआ।
              जय जय श्री राधे राधे जी आप सभी को

Monday, May 6, 2019

Bhagwat Geeta Gyan

"गीता-दर्पण" से लिया गया ।

 प्रश्न:-जिसके पाप बहुत हैं ,वह भगवान् का नाम नहीं ले सकता;अतः
वह क्या करे?

  उत्तर:-- बात सच्ची है । जिसके अधिक पाप होते हैं, वह भगवान् का 

नाम नहीं ले सकता ।      

#श्लोक           
 ।। वैष्णवे भगवद्भक्तौ प्रसादे हरिनाम्नि च।
          अल्पपुण्यवतां श्रद्धा यथावन्नैव जायते ।।


      अर्थात जिसका पुण्य थोड़ा होता है, उसकी भक्तोंमें, भक्तिमें,           भगवत्प्रसादमें और भगवन्नाममें श्रद्धा
नहीं होती ।
                  जैसे पित्तका जोर होनेपर
रोगी को मिश्री भी कड़वी लगती है ।
परन्तु यदि वह मिश्रीका सेवन करता
रहे तो पित्त शान्त हो जाता है और मिश्री मीठी लगने लग जाती है ।
  ऐसे ही पाप अधिक होनेसे नाम अच्छा नहीं लगता; परन्तु नामजप
करना शुरू कर दें तो पाप नष्ट हो जायँगे और नाम अच्छा, मीठा लगने लग जायगा तथा नामजपका प्रत्यक्ष
लाभ भी  दीखने लग जायगा ।


       " गीता दर्पण "

Tuesday, March 12, 2019

Bhagwat katha 2019 भक्त अजामिल प्रसंग

श्रीमद भागवत महापुराण कथा में वर्णित महापापी अजामिल का सम्पूर्ण प्रसंग एक बार अवश्य पढ़ें

Pramod krishna Shastri
call 8737866555

शुकदेवजी महाराज राजा परीक्षित से कहते हैं,कि हे प्रिय परीक्षित्! यह कथा परम गोपनीय—अत्यन्त रहस्यमय है                        

 मलय पर्वत पर विराजमान भगवान् अगस्त्यजी ने



श्रीहरि की पूजा करते समय मुझे यह सुनाया था,आप भी सुने,,,,,



कान्यकुब्ज (कन्नौज) में एक ब्राम्हण रहता था। उसका नाम अजामिल था। यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद्गुणों का तो यह खजाना ही था। ब्रम्हचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, मन्त्रवेत्ता और पवित्र भी था। इसने गुरु, संत-महात्माओं सबकी सेवा की थी। एक बार अपने पिता के आदेशानुसार वन में गया और वहाँ से फल-फूल, समिधा तथा कुश लेकर घर के लिये लौटा। लौटते समय इसने देखा की एक व्यक्ति मदिरा पीकर किसी वेश्या के साथ विहार कर रहा है।

वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। अजामिल ने पाप किया नहीं केवल आँखों से देखा और काम के वश हो गया । अजामिल ने अपने मन को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्या का चिन्तन करने लगा और अपने धर्म से विमुख हो गया ।

अजामिल सुन्दर-सुन्दर वस्त्र-आभूषण आदि
Pramod krishna Shastri
call 87378666
वस्तुएँ, जिनसे वह प्रसन्न होती, ले आता। यहाँ तक कि इसने अपने पिता की सारी सम्पत्ति देकर भी उसी कुलटा को रिझाया। 

               यह ब्राह्मण उसी प्रकार की चेष्टा करता, जिससे वह वेश्या प्रसन्न हो।
इस वेश्या के चक्कर में इसने अपनी कुलीन नवयुवती विवाहिता पत्नी तक का परित्याग कर दिया और उस वैश्या के साथ रहने लगा। इसने बहुत दिनों तक वेश्या के मल-समान अपवित्र अन्न से अपना जीवन व्यतीत किया और अपना सारा जीवन ही पापमय कर लिया। यह कुबुद्धि न्याय से, अन्याय से जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहीं से उठा लाता। उस वेश्या के बड़े कुटुम्ब का पालन करने में ही यह व्यस्त रहता। चोरी से, जुए से और धोखा-धड़ी से अपने परिवार का पेट पालता था।
एक बार कुछ संत इसके गांव में आये। गाँव के बाहर संतों ने कुछ लोगों से पूछा की भैया, किसी ब्राह्मण का घर बताइए हमें वहां पर रात गुजारनी है। इन लोगों ने संतों के साथ मजाक किया और कहा- संतों- हमारे गाँव में तो एक ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है जिसका नाम है अजामिल। और इतना बड़ा भगवान का भक्त है की गाँव के अंदर नहीं रहता गाँव के बाहर ही रहता है।
अब संत जन अजामिल के घर पहुंचे और दरवाजा खटखटाया- भक्त अजामिल दरवाजा खोलो। जैसे ही अजामिल ने आज दरवाजा खोला तो संतों के दर्शन करते ही उसे अपने पुराने अच्छे कर्म याद आ गए।
संतों ने कहा की भैया- रात बहुत हो गई है आप हमारे लिए भोजन और सोने का प्रबंध कीजिये।अजामिल ने सुंदर भोजन तैयार करवाया और संतो को करवाया। जब अजामिल ने संतों से सोने के लिए कहा तो संत कहते हैं भैया- हम प्रतिदिन सोने से पहले कीर्तन करते हैं। यदि आपको समस्या न हो तो हम कीर्तन करलें?
अजामिल ने कहा- आप ही का घर है महाराज! जो दिल में आये सो करो।
संतों ने सुंदर कीर्तन प्रारम्भ किया और उस कीर्तन में अजामिल बैठा। सारी रात कीर्तन चला और अजामिल की आँखों से खूब आसूं गिरे हैं। मानो आज आँखों से आंसू नहीं पाप धूल गए हैं। उसने सारी रात भगवान का नाम लिया ।
जब सुबह हुई संत जन चलने लगे तो अजामिल ने कहा- महात्माओं, मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं कोई भक्त वक्त नहीं हूँ। मैं तो एक महा पापी हूँ। मैं वैश्या के साथ रहता हु और मुझे गाँव से बाहर निकाल दिया गया है केवल आपकी सेवा के लिए मैंने आपको भोजन करवाया नहीं तो मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है।
संतों ने कहा- अरे अजामिल! तूने ये बात हमें कल क्यों नहीं बताई, हम तेरे घर में रुकते ही नहीं।
अब तूने हमें आश्रय दिया है तो चिंता मत कर। ये बता तेरे घर में कितने बालक हैं। अजामिल ने बता दिया की महाराज 9 बच्चे हैं और अभी ये गर्भवती है।
संतों ने कहा की अबके जो तेरे संतान होंगी वो तेरे पुत्र होगा। और तू उसका नाम “नारायण” रखना। जा तेरा कल्याण हो जायेगा।
संत जन आशीर्वाद देकर चले गए। समय बिता उसके पुत्र हुआ। नाम रखा नारायण। अजामिल अपने नारायण पुत्र में बहुत आशक्त था। अजामिल ने अपना सम्पूर्ण हृदय अपने बच्चे नारायण को सौंप दिया था। हर समय अजामिल कहता था- नारायण भोजन करलो।
नारायण पानी पी लो। नारायण तुम्हारा खेलने का समय है तुम खेल लो। हर समय नारायण नारायण करता था।
इस तरह अट्ठासी वर्ष बीत गए। वह अतिशय मूढ़ हो गया था, उसे इस बात का पता ही न चला कि मृत्यु मेरे सिर पर आ पहुँची है ।
अब वह अपने पुत्र बालक नारायण के सम्बन्ध में ही सोचने-विचारने लगा। इतने में ही अजामिल ने देखा कि उसे ले जाने के लिये अत्यन्त भयावने तीन यमदूत आये हैं। उनके हाथों में फाँसी है, मुँह टेढ़े-टेढ़े हैं और शरीर के रोएँ खड़े हुए हैं । उस समय बालक नारायण वहाँ से कुछ दूरी पर खेल रहा था।
यमदूतों को देखकर अजामिल डर गया और अपने पुत्र को कहता हैं-नारायण! नारायण मेरी रक्षा करो! नारायण मुझे बचाओ!
भगवान् के पार्षदों ने देखा कि यह मरते समय हमारे स्वामी भगवान् नारायण का नाम ले रहा है, उनके नाम का कीर्तन कर रहा है; अतः वे बड़े वेग से झटपट वहाँ आ पहुँचे । उस समय यमराज के दूर दासीपति अजामिल के शरीर में से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। विष्णु दूतों ने बलपूर्वक रोक दिया ।
उनके रोकने पर यमराज के दूतों ने उनसे कहा—‘अरे, धर्मराज की आज्ञा का निषेध करने वाले तुम लोग हो कौन ? तुम किसके दूत हो, कहाँ से आये हो और इसे ले जाने से हमें क्यों रोक रहे हो ?
जब यमदूतों ने इस प्रकार कहा, तब भगवान् नारायण के आज्ञाकारी पार्षदों ने हँसकर कहा—यमदूतों! यदि तुम लोग सचमुच धर्मराज के आज्ञाकारी हो तो हमें धर्म का लक्षण और धर्म का तत्व सुनाओ । दण्ड का पात्र कौन है ?
यमदूतों ने कहा—वेदों ने जिन कर्मों का विधान किया है, वे धर्म हैं और जिनका निषेध किया है, वे अधर्म हैं। वेद स्वयं भगवान् के स्वरुप हैं। वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास एवं स्वयं प्रकाश ज्ञान हैं—ऐसा हमने सुना है । पाप कर्म करने वाले सभी मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार दण्डनीय होते हैं ।
भगवान् के पार्षदों ने कहा—यमदूतों! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि धर्मज्ञों की सभा में अधर्म प्रवेश कर रह है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियों को व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है । यमदूतों! इसने कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशि का पूरा-पूरा प्रायश्चित कर लिया है।
क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान् के परम कल्याणमय (मोक्षप्रद) नाम का उच्चारण तो किया है । जिस समय इसने ‘नारायण’ इन चार अक्षरों का उच्चारण किया, उसी समय केवल उतने से ही इस पापी के समस्त पापों का प्रायश्चित हो गया ।
चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रम्हघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगों का संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गाय को मारने वाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभी के लिये यही—इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है कि भगवान् के नामों का उच्चारण किया जाय; क्योंकि भगवन्नामों के उच्चारण से मनुष्य की बुद्धि भगवान् के गुण, लीला और स्वरुप में रम जाती है और स्वयं भगवान् की उसके प्रति आत्मीय बुद्धि हो जाती है ।
तुम लोग अजामिल को मत ले जाओ। इसने सारे पापों का प्रायश्चित कर लिया है, क्योंकि इसने मरते समय भगवान् के नाम का उच्चारण किया है।
इस प्रकार भगवान् के पार्षदों ने भागवत-धर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया भगवान् की महिमा सुनने से अजामिल के हृदय में शीघ्र ही भक्ति का उदय हो गया।
अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चाताप होने लगा । (अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ! मैंने एक दासी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राम्हणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दुःख की बात है। धिक्कार है! मुझे बार-बार धिक्कार है! मैं संतों के द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ! मैंने अपने कुल में कलंक का टीका लगा दिया!
मेरे माँ-बाप बूढ़े और तपस्वी थे। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह! मैं कितना कृतघ्न हूँ। मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरक में गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकार की यमयातना भोगते हैं। कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रम्हतेज को नष्ट करने वाला तथा कहाँ भगवान् का वह परम मंगलमय ‘नारायण’ नाम! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया)।
अब मैं अपने मन, इन्द्रिय और प्राणों को वश में करके ऐसा प्रयत्न करूँगा कि फिर अपने को घोर अन्धकारमय नरक में न डालूँ । मैंने यमदूतों के डर अपने पुत्र “नारायण” को पुकारा। और भगवान के पार्षद प्रकट हो गए यदि मैं वास्तव में नारायण को पुकारता तो क्या आज श्री नारायण मेरे सामने प्रकट नहीं हो जाते?
अब अजामिल के चित्त में संसार के प्रति तीव्र वैराग्य हो गया। वे सबसे सम्बन्ध और मोह को छोड़कर हरिद्वार चले गये। उस देवस्थान में जाकर वे भगवान् के मन्दिर में आसन से बैठ गये और उन्होंने योग मार्ग का आश्रय लेकर अपनी सारी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन में लीन कर लिया और मन को बुद्धि में मिला दिया।
इसके बाद आत्मचिन्तन के द्वारा उन्होंने बुद्धि को विषयों से पृथक् कर लिया तथा भगवान् के धाम अनुभव स्वरुप परब्रम्ह में जोड़ दिया । इस प्रकार जब अजामिल की बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर भगवान् के स्वरुप में स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं।
अजामिल ने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। उनका दर्शन पाने के बाद उन्होंने उस तीर्थस्थान में गंगा के तट पर अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान् के पार्षदों का स्वरुप प्राप्त कर दिया ।
अजामिल भगवान् के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से भगवान् लक्ष्मीपति के निवास स्थान वैकुण्ठ को चले गये।
शुकदेव जी महाराज कहते हैं परीक्षित्! यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और समस्त पापों का नाश करने वाला है। जो पुरुष श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह नरक में कही नहीं जाता। यमराज के दूत तो आँख उठाकर उसकी ओर देख तक नहीं सकते।
उस पुरुष का जीवन चाहे पापमय ही क्यों न रहा हो, वैकुण्ठलोक में उसकी पूजा होती है । परीक्षित्! देखो-अजामिल-जैसे पापी ने मृत्यु के समय पुत्र के बहाने भगवान् नाम का उच्चारण किया! उसे भी वैकुण्ठ की प्राप्ति हो गयी! फिर जो लोग श्रद्धा के साथ भगवन्नाम का उच्चारण करते हैं, उनकी तो बात ही क्या है ।
यमदूत और यमराज का संवाद
जब भगवान के पार्षदों ने यमदूतों से अजामिल को छुड़ाया तो यमदूत यमराज के पास पहुंचे और कहते हैं-
प्रभो! संसार के जीव तीन प्रकार के कर्म करते हैं—पाप, पुण्य अथवा दोनों से मिश्रित। इन जीवों को उन कर्मों का फल देने वाले शासक संसार में कितने हैं ?
हम तो ऐसा समझते हैं कि अकेले आप ही समस्त प्राणियों और उनके स्वामियों के भी अधीश्वर हैं। आप ही मनुष्यों के पाप और पुण्य के निर्णायक, दण्डदाता और शासक हैं।
यमराज ने कहा—दूतों! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत् के स्वामी हैं। उन्हीं में यह सम्पूर्ण जगत् सूत में वस्त्र के समान ओत-प्रोत है। उन्हीं के अंश, ब्रम्हा, विष्णु और शंकर इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं। उन्हीं ने इस सारे जगत् को नथे हुए बैल के समान अपने अधीन कर रखा है।
मेरे प्यारे दूतों! जैसे किसान अपने बैलों को पहले छोटी-छोटी रस्सियों में बाँधकर फिर उन रस्सियों को एक बड़ी आड़ी रस्सी में बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्वर भगवान् ने भी ब्रम्हाणादि वर्ण और ब्रम्हचर्य आदि आश्रम रूप छोटी-छोटी नाम की रस्सियों में बाँधकर फिर सब नामों को वेदवाणी रूप बड़ी रस्सी में बाँध रखा है। इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्म रूप बन्धन में बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं।
सभी भगवान के आधीन हैं इनमें मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रम्हा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रूद्र, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता।
भगवान् के नामोच्चारण की महिमा तो देखो, अजामिल-जैसा पापी भी एक बार नामोच्चारण करने मात्र से मृत्युपाश से छुटकारा पा गया। भगवान् के गुण, लीला और नामों का भलीभाँति कीर्तन मनुष्यों के पापों का सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा फल नहीं है, क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिल ने मरने के समय चंचल चित्त से अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ उच्चारण किया।
उस नामाभासमात्र से ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्ति की प्राप्ति भी हो गयी। बड़े-बड़े विद्वानों की बुद्धि कभी भगवान् की माया से मोहित हो जाती है। वे कर्मों के मीठे-मीठे फलों का वर्णन करने वाली अर्थवाद रूपिणी वेदवाणी में ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि बड़े-बड़े कर्मों में ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नाम की महिमा को नहीं जानते।
यह कितने खेद की बात है। प्रिय दूतों! बुद्धिमान् पुरुष ऐसा विचार कर भगवान् अनन्त में ही सम्पूर्ण अन्तःकरण से अपना भक्तिभाव स्थापित करते हैं। वे मेरे दण्ड के पात्र नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं, लेकिन यदि कदाचित् संयोगवश कोई पाप बन भी जाय, तो उसे भगवान् का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है।
जिनकी जीभ भगवान् के गुणों और नामों का उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके चरणारविन्दों का चिन्तन नहीं करता और जिनका सिर एक बार भी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में नहीं झुकता, उन भगवत्सेवा-विमुख पापियों को ही मेरे पास लाया करो।
जब यमदूतों ने अपने स्वामी धर्मराज के मुख से इस प्रकार भगवान् की महिमा सुनी और उसका स्मरण किया, तब उनके आश्चर्य की सीमा न रही। तभी से वे धर्मराज की बात पर विश्वास करके अपने नाश की आशंका से भगवान् के आश्रित भक्तों के पास नहीं जाते और तो क्या, वे उनकी ओर आँख उठाकर देखने में भी डरते हैं।
प्रिय परीक्षित्! यह इतिहास परम गोपनीय है।
                            माहत्य
विशेष- प्रभु ने यह अपना अनुग्रह प्रकट करने के लिए किया इसी लिए कहते हे की प्रभु कर्तुम अकर्तुम अन्यथाकर्तुम सर्वसमर्थ है।आज की एकादशी उसी अजामिल के नाम से अजा एकादशी कहलाती है.
ये अध्याय से यह सीख मिलती है कि  हम सब पुष्टि वैष्णवो को ठाकुरजी की सेवा और नाम किर्तन सतत अंतिम श्र्वास तक करना है , कितनी भी विषम परिस्थिति हमारे जीवन में क्यों न आए ?
ठाकुरजी की सेवा और ठाकुरजी से स्नेह यही पुष्टि जीव का लक्ष्य होना चाहिए ।
मनुष्य चाहे जितना बड़ा पापी हो , चाहे जितना नि:साधन हो ; यदि सच्चे ह्रदय से एकबार भी प्रभु की शरण स्वीकार ले तो प्रभु उसको " स्वजन " मान लते हैं . इसीलिए महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी  ने "कृष्णाश्रयस्तोत्र" में कहा हैं :-
"पापसक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम"
भावार्थ :- सुखी हो या दु:खी , पापी हो या निष्पाप , धनवान हो या निर्धन , साधन-सम्पन्न हो या नि:साधन ; सभी को श्रीकृष्ण की शरण में ही जाना चाहिए .
          सब देवें के देव , सर्वशक्तिमान , सर्वकारण ऐसे श्रीकृष्ण को छोड़ कर अन्य किसी की शरण में क्यों जाएँ ?
      इसीलिए पुष्टिमार्ग श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति का मार्ग
दिखाता/सिखाता है ।

Saturday, March 2, 2019

Bhagwat katha 2019

।। भक्ति क्या है? भक्ति से क्या लाभ है ???
Pramod krishna Shastri
call 08737866555

भक्ति के बिना जीव उसी तरह अधूरा होता है जिस प्रकार लवण (नमक)बिना भोजन अधूरा होता है


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भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥8॥
भावार्थ:-जो प्राणी उसे प्रेम के साथ खोजता है, वह सब सुखों की खान इस भक्ति रूपी मणि को पा जाता है। हे प्रभो! मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि श्री रामजी के दास श्री रामजी से भी बढ़कर हैं॥8॥
भक्ति की भावना से ही हम इस सत्य को अनुभव करते हैं, कि ईश्वर ने हमे कितना कुछ दिया है।वह हमारे प्रति कितना उदार है। इससे हमें अपनी लघुता और उसकी महानताका बोध होता है, अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण की शक्ति प्राप्त होती है ,और दूसरे जीवों के प्रति प्रेम काभाव पैदा होता है।
भक्ति कैसे की जाती है?
शास्त्रों में हमें अनेक प्रकार के भक्ति मार्गों का वर्णन मिलेगा।हमारे श्रीरूप गोस्वामी जी ने भक्ति के 64 तरीके बताए हैं। प्रहलाद ने श्रीमद््भागवत में भगवान को प्रसन्न करनेके 9 तरीके बताए हैं।
ये हैं श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन व दास्य भाव आदि। श्री चैतन्य चरितामृतमें भगवान के ही मुख से कहलायागया है कि मैं पाँच तरह से बहुत प्रसन्न होता हूँ। ये हैं साधु-संग, नाम-कीर्तन, भगवत्-श्रवण, तीर्थ वास औरश्रद्धा के साथ श्रीमूर्ति सेवा।
वे आगेकहते हैं कि इन पांचों में से यदि किसीमार्ग का अवलंबन श्रद्धा के साथ कियाजाए तो वह हृदय में भगवत प्रेमउत्पन्न करेगा। इस विषय में महाप्रभुकहते हैं कि नवधा भक्ति के नौ अंगों में से किसी एक अंग का भी आचरणकरने से भगवत-प्रेम की प्राप्ति होसकती है। परन्तु इन नौ अंगों में भीश्रवण, कीर्तन व स्मरण रूप श्रेष्ठ है।
इन सभी मार्गों में श्रेष्ठ भक्ति मार्ग कौन सा है?
सरल भक्त-जीवन मेंकेवल नामाश्रय ही सर्वोत्तम साधन हैभगवान की प्राप्ति का। नवधा भक्ति मेंभी श्रीनाम के जाप और स्मरण कोसर्वश्रेष्ठ बताया गया है। यदि निश्छलभाव से हरिनाम का कीर्तन किया जाएतो अल्प समय में ही प्रभु की कृपाप्राप्त होगी। नाम संकीर्तन करना हीभगवान् को प्रसन्न करने का सर्वोत्तमतरीका है, यही सर्वोत्तम भजन है। जिसयुग में हम रह रहे हैं, इस में तोभवसागर पार जाने का यही एक उपायहै। शास्त्र तो कहते हैं कि कलिकाल मेंएकमात्र हरिनाम संकीर्तन के द्वारा हीभगवान की आराधना होती है।
नाम संकीर्तन का सुझाव किन ग्रंथों में दिया गया है?
श्रीमद्भागवत कहता है कि कलियुग में श्रीहरिनाम-संकीर्तनयज्ञ के द्वारा ही आराधना करनाशास्त्रसम्मत है। वे लोग बुद्धिमान हैं जोनाम संकीर्तन रूपी यज्ञ के द्वारा कृष्णकी आराधना करते हैं।
रामचरित मानसमें भी कहा गया है कि कलियुग में भवसागर पार करने के लिए राम नामछोड़ कर और कोई आधार नहीं है।
कलियुग समजुग आन नहीं, जो नरकर विश्वास।गाई राम गुण गनविमल, भव तर बिनहिं प्रयास।
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥
भावार्थ:-वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्री रामजी की नाना प्रकार की कथाएँ उन पर्वतों में सुंदर खानें हैं। संत पुरुष (उनकी इन खानों के रहस्य को जानने वाले) मर्मी हैं और सुंदर बुद्धि (खोदने वाली) कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य ये दो उनके नेत्र हैं॥
नाम संकीर्तन में कथा श्रवण काक्या महत्व है?
जीवन में ऐसाअक्सर देखने को मिलता कि किसीव्यक्ति या स्थान को हमने देखा तकनहीं होता, परन्तु उनके बारे में समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में पढ़ने से हमें काफीआनंद मिलता है।
 ठीक इसी प्रकारभगवद धाम, आनन्द धाम, वहाँ केवातावरण या प्रभु की लीलाओं के बारेमें सुन कर हमें आनंद प्राप्त होता है, हमारा चित्त स्थिर होता है और चंचलमन भटकने से रुकता है। ये कथाएंहमारे वेद-शास्त्रों में वर्णित हैं, जिन्हेंपढ़ने या सुनने से हमें भगवान केविषय में कुछ जानकारी भी प्राप्त होतीहै।
भजन -कीर्तन करने से क्याहोता है और इसे किस प्रकार करनाचाहिए?
गोस्वामी जी कहते हैं किआप भक्ति का कोई भी मार्ग अपनाएं, उसे श्रीनाम कीर्तन के संयोग से हीकरें। इसका फल अवश्य प्राप्त होता हैऔर शीघ्र प्राप्त होता है। सब कहते हैंकि भगवान का भजन करो.....भजनकरो! तो क्या करें हम भगवान काभजन करने के लिए?
सच्चे भक्तों केसंग हरिनाम संकीर्तन करना ही सर्वोत्तम भगवद भजन है। सच्चे भक्तों के साथमिलकर, उनके आश्रय में रहकर नाम-संकीर्तन करने से एक अद्भुत प्रसन्नताहोती है, उसमें सामूहिकता होती है, व्यक्तिगत अहंकार नहीं होता और उतनीप्रसन्नता अन्य किसी भी साधन सेनहीं होती, इसीलिए इसे सर्वोत्तमहरिभजन माना गया है।

Wednesday, February 6, 2019

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण में सुंदरकांड का नाम सुंदरकांड क्यों रखा??

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने सुंदरकांड का नाम सुंदरकांड क्यों रखा पूरा पढ़ें???

हनुमान जी,  सीताजी की खोज में  लंका गए थे और लंका  त्रिकुटाचल  पर्वत पर बसी हुई थी ! त्रिकुटाचल  पर्व यानी  यहां 3 पर्वत थे !
                    पहला  सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध  हुआ था ! दूसरा नील  पर्वत, जहां  राक्षसों  कें  महल  बसे हुए  थे ! और  तीसरे पर्वत  का  नाम  है  सुंदर  पर्वत, जहां  अशोक  वाटिका  नीर्मित थी !  इसी  वाटिका  में 
      श्री  हनुमानजी  और  सीता जी  की  भेंट  हुई  थी ! 
इस  काण्ड  की  यही सबसे  प्रमुख  घटना  थी, इस लिए  इसका  नाम  सुंदरकांड  रखा  गया  है !

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शुभ अवसरों पर सुंदरकांड का पाठ क्यों ?


शुभ  अवसरों  पर  गोस्वामी  तुलसी दास जी  द्वारा  रचित  श्रीराम चरित मानस  कें  सुंदरकांड  का  पाठ  किया  जाता  हैं !  शुभ  कार्यों  की  शुरूआत  से पहले सुंदरकांड  का  पाठ करने का  विशेष  महत्व माना  गया  है ! 
जबकि  किसी  व्यक्ति  कें  जीवन  में ज्यादा  परेशानीयाँ  हो, कोई  काम  नहीं  बन  पा  रहा  हो, आत्मविश्वास  की  कमी  हो  या  कोई  और  समस्या  हो, सुंदरकांड  के पाठ  से शुभ फल  प्राप्त  होने  लग जाते  हैं |  कई  ज्योतिषी  या  संत  भी  विपरीत  परिस्थितियों  में  सुंदरकांड  करने की  सलाह  देते  हैं !


जानिए  सुंदरकांड  का  पाठ  विषेश  रूप  सें  क्यों  किया  जाता  हैं ???


माना  जाता  हैं  कि  सुंदरकांड  कें  पाठ  सें  हनुमानजी  प्रसन्न होते हैं ! 
सुंदरकांड  के पाठ  में  बजरंगबली  की  कृपा  बहुत  ही  जल्द  प्राप्त हो  जाती  है !
जो लोग नियमित रूप से सुंदरकांड  का पाठ  करते हैं, उनके सभी दुख  दूर हो जाते हैं | इस  काण्ड  में  हनुमानजी  ने अपनी  बुद्धि  और  बल  से सीता  की  खोज  की  है ! 
इसी  वजह  से सुंदरकांड  को  हनुमानजी  की सफलता  के  लिए  याद  किया  जाता है !


सुंदरकांड से मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ ??



वास्तव  में  श्रीरामचरितमानस  के सुंदरकांड  की  कथा  सबसे  अलग  है, संपूर्ण  श्रीरामचरितमानस  भगवान  श्रीराम  के गुणों  और  उनके पुरूषार्थ  को  दर्शाती  है, सुंदरकांड  एकमात्र  ऐसा  अध्याय है जो  श्रीराम  के भक्त  हनुमान  की  विजय का कांड है ! मनोवैज्ञानिक  नजरिए  से देखा  जाए  तो  यह  आत्मविश्वास  और  इच्छाशक्ति   बढ़ाने  वाला  काण्ड  है | सुंदरकांड  के पाठ  से व्यक्ति  को  मानसिक  शक्ति  प्राप्त  होती  है, किसी  भी  कार्य  को  पूर्ण  करनें  के लिए  आत्मविश्वास  मिलता  है !


सुंदरकांड से मिलता है धार्मिक लाभ ??



सुंदरकांड  के पाठ से मिलता  है धार्मिक लाभ | हनुमानजी की  पूजा  सभी मनोकामनाओं  को  पूर्ण  करने वाली मानी  गई  है,  बजरंगबली बहुत जल्दी  प्रसन्न  होने  वाले देवता  हैं, शास्त्रों  में  इनकी कृपा  पाने  के  कई उपाय बताए गए  हैं, इन्हीं उपायों में  सें  एक  उपाय  सुंदरकांड  का  पाठ  करना  है, सुंदरकांड  के पाठ  से हनुमानजी  के साथ ही श्रीराम की  भी विषेश  कृपा  प्राप्त  होती  है !
किसी  भी  प्रकार  की  परेशानी  हो  सुंदरकांड  के पाठ  से दूर  हो  जाती  है, यह  ऐक  श्रेष्ठ  और  सरल  उपाय  है,  इसी  वजह से काफी लोग  सुंदरकांड  का  पाठ  नियमित  रूप  से करते हैं, हनुमानजी  जो  कि  वानर  थे, वे  समुद्र  को  लांघ कर  लंका  पहुंच  गए  | वहां  सीता  की  खोज  की, लंका  को  जलाया, सीता  का  संदेश  लेकर  श्रीराम  के  पास  लौट  आए,  यह एक  भक्त   की  जीत  का  काण्ड  है,  जो अपनी  इच्छाशक्ति  के  बल  पर  इतना  बड़ा  चमत्कार  कर  सकता  है, सुंदरकांड  में जीवन की सफलता के  महत्वपूर्ण  सूत्र भी  दिए  गए  हैं,  इसलिए  पूरी  रामायण  में  सुंदरकांड  को  सबसें  श्रेष्ठ  माना  जाता  है, क्योंकि  यह  व्यक्ति  में आत्मविश्वास  बढ़ाता  है,  इसी वजह से सुंदरकांड का पाठ  विषेश रूप से किया जाता  है।


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Thursday, January 24, 2019

हिंदू धर्मग्रंथों का सार, जानिए किस ग्रंथ में क्या है?

हिंदू धर्मग्रंथों का सार, जानिए किस ग्रंथ में क्या है???〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸अधिकतर हिंदुओं के पास अपने ही धर्मग्रंथ को पढ़ने की फुरसत नहीं है। वेद, उपनिषद पढ़ना तो दूर वे गीता तक को नहीं पढ़ते जबकि गीता को एक घंटे में पढ़ा जा सकता है। हालांकि कई जगह वे भागवत पुराण सुनने या रामायण का अखंड पाठ करने के लिए समय निकाल लेते हैं या घर में सत्यनारायण की कथा करवा लेते हैं। लेकिन आपको यह जानकारी होना चाहिए कि पुराण, रामायण और महाभारत हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं है। धर्मग्रंथ तो वेद ही है। 



शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है:- श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की

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पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। 

वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है। आओ जानते हैं कि उक्त ग्रंथों में क्या है।




वेदों में क्या है?


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वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। वेद चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

ऋग्वेद👉 ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।


यजुर्वेद👉 यजु अर्थात गतिशील आकाश एवं कर्म। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

सामवेद👉  साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसी से शास्त्रिय संगीत और नृत्य का जिक्र भी मिलता है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें संगीत के विज्ञान और मनोविज्ञान का वर्णन भी मिलता है।


अथर्वदेव👉 थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसमें भारतीय परंपरा और ज्योतिष का ज्ञान भी मिलता है।



उपनिषद के बारे में

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उपनिषद वेदों का सार है। सार अर्थात निचोड़ या संक्षिप्त। उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। ईश्वर है या नहीं, आत्मा है या नहीं, ब्रह्मांड कैसा है आदि सभी गंभीर, तत्व ज्ञान, योग, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि की बातें उपनिषद में मिलेगी। उपनिषदों को प्रत्येक हिन्दुओं को पढ़ना चाहिए। इन्हें पढ़ने से ईश्वर, आत्मा, मोक्ष और जगत के बारे में सच्चा ज्ञान मिलता है।

वेदों के अंतिम भाग को 'वेदांत' कहते हैं। वेदांतों को ही उपनिषद कहते हैं। उपनिषद में तत्व ज्ञान की चर्चा है। उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गए हैं, जैसे- 1. ईश, 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छांदोग्य, 10. बृहदारण्यक, 11. कौषीतकि और 12. श्वेताश्वतर।


षड्दर्शन क्या है?


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वेद से निकला षड्दर्शन : वेद और उपनिषद को पढ़कर ही 6 ऋषियों ने अपना दर्शन गढ़ा है। इसे भारत का षड्दर्शन कहते हैं। दरअसल यह वेद के ज्ञान का श्रेणीकरण है। ये छह दर्शन हैं:- 1.न्याय, 2.वैशेषिक, 3.सांख्य, 4.योग, 5.मीमांसा और 6.वेदांत। वेदों के अनुसार सत्य या ईश्वर को किसी एक माध्यम से नहीं जाना जा सकता। इसीलिए वेदों ने कई मार्गों या माध्यमों की चर्चा की है।


गीता में क्या है?

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महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता में भी कुल 18 अध्याय हैं। 10 अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। वेदों के ज्ञान को नए तरीके से किसी ने व्यवस्थित किया है तो वह हैं भगवान श्रीकृष्ण। अत: वेदों का पॉकेट संस्करण है गीता जो हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र ग्रंथ है। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। गीता को बार बार पढ़ने के बाद ही वह समझ में आने लगती है।

गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म मार्ग की चर्चा की गई है। उसमें यम-नियम और धर्म-कर्म के बारे में भी बताया गया है। गीता ही कहती है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है। गीता को बार-बार पढ़ेंगे तो आपके समक्ष इसके ज्ञान का रहस्य खुलता जाएगा। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है।

गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकासक्रम, हिन्दू संदेवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म, कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी, देवता, उपासना, प्रार्थना, यम, नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है।

श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है, जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। गीता को अर्जुन के अलावा और संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता में श्रीकृष्ण ने- 574, अर्जुन ने- 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने- 1 श्लोक कहा है।


उपरोक्त ग्रंथों के ज्ञान का सार बिंदूवार :
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1.ईश्वर के बारे में :

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ब्रह्म (परमात्मा) एक ही है जिसे कुछ लोग सगुण (साकार) कुछ लोग निर्गुण (निराकार) कहते हैं। हालांकि वह अजन्मा, अप्रकट है। उसका न कोई पिता है और न ही कोई उसका पुत्र है। वह किसी के भाग्य या कर्म को नियंत्रित नहीं करता। ना कि वह किसी को दंड या पुरस्कार देता है। उसका न तो कोई प्रारंभ है और ना ही अंत। वह अनादि और अनंत है। उसकी उपस्थिति से ही संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है। सभी कुछ उसी से उत्पन्न होकर अंत में उसी में लीन हो जाता है। ब्रह्मलीन।

2.ब्रह्मांड के बारे में :

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यह दिखाई देने वाला जगत फैलता जा रहा है और दूसरी ओर से यह सिकुड़ता भी जा रहा है। लाखों सूर्य, तारे और धरतीयों का जन्म है तो उसका अंत भी। जो जन्मा है वह मरेगा। सभी कुछ उसी ब्रह्म से जन्में और उसी में लीन हो जाने वाले हैं। यह ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। इस जगत का संचालन उसी की शक्ति से स्वत: ही होता है। जैसे कि सूर्य के आकर्षण से ही धरती अपनी धूरी पर टिकी हुई होकर चलायमान है। उसी तरह लाखों सूर्य और तारे एक महासूर्य के आकर्षण से टिके होकर संचालित हो रहे हैं। उसी तरह लाखों महासूर्य उस एक ब्रह्मा की शक्ति से ही जगत में विद्यमान है।

3.आत्मा के बारे में :

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आत्मा का स्वरूप ब्रह्म (परमात्मा) के समान है। जैसे सूर्य और दीपक में जो फर्क है उसी तरह आत्मा और परमात्मा में फर्क है। आत्मा के शरीर में होने के कारण ही यह शरीर संचालित हो रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि संपूर्ण धरती, सूर्य, ग्रह नक्षत्र और तारे भी उस एक परमपिता की उपस्थिति से ही संचालित हो रहे हैं।

आत्मा का ना जन्म होता है और ना ही उसकी कोई मृत्यु है। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। यह आत्मा अजर और अमर है। आत्मा को प्रकृति द्वारा तीन शरीर मिलते हैं एक वह जो स्थूल आंखों से दिखाई देता है। दूसरा वह जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं जो कि ध्यानी को ही दिखाई देता है और तीसरा वह शरीर जिसे कारण शरीर कहते हैं उसे देखना अत्यंत ही मुश्लिल है। बस उसे वही आत्मा महसूस करती है जो कि उसमें रहती है। आप और हम दोनों ही आत्मा है हमारे नाम और शरीर अलग अलग हैं लेकिन भीतरी स्वरूप एक ही है।

4.स्वर्ग और नरक के बारे में :

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वेदों के अनुसार पुराणों के स्वर्ग या नर्क को गतियों से समझा जा सकता है। स्वर्ग और नर्क दो गतियां हैं। आत्मा जब देह छोड़ती है तो मूलत: दो तरह की गतियां होती है:- 1.अगति और 2. गति।

1.अगति:👉 अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।

2.गति 👉 गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है या वह अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

अगति के चार प्रकार है-1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।

क्षिणोदर्क 👉 क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है।

भूमोदर्क 👉 भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है।

अगति 👉 अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है।

दुर्गति 👉 दुर्गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।

गति के भी 4 प्रकार :-गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं:- 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।

तीन मार्गों से यात्रा :〰️〰️〰️〰️〰️

जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। ऐसा कहते हैं कि उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ये तीन मार्ग हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।

5.धर्म और मोक्ष के बारे में :

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धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का अर्थ है यम और नियम को समझकर उसका पालन करना। नियम ही धर्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य होता है। हिंदु धर्म के अनुसार व्यक्ति को मोक्ष के बारे में विचार करना चाहिए। मोक्ष क्या है? स्थितप्रज्ञ आत्मा को मोक्ष मिलता है। मोक्ष का भावर्थ यह कि आत्मा शरीर नहीं है इस सत्य को पूर्णत: अनुभव करके ही अशरीरी होकर स्वयं के अस्तित्व को पूख्‍ता करना ही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।


6.व्रत और त्योहार के बारे में :


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हिन्दु धर्म के सभी व्रत, त्योहार या तीर्थ सिर्फ मोक्ष की प्राप्त हेतु ही निर्मित हुए हैं। मोक्ष तब मिलेगा जब व्यक्ति स्वस्थ रहकर प्रसन्नचित्त और खुशहाल जीवन जीएगा। व्रत से शरीर और मन स्वस्थ होता है। त्योहार से मन प्रसन्न होता है और तीर्थ से मन और मस्तिष्क में वैराग्य और आध्यात्म का जन्म होता है।


मौसम और ग्रह नक्षत्रों की गतियों को ध्यान में रखकर बनाए गए व्रत और त्योहार का महत्व अधिक है। व्रतों में चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा, श्रावण मास और कार्तिक मास के दिन व्रत रखना श्रेष्ठ है। यदि उपरोक्त सभी नहीं रख सकते हैं तो श्रावण के पूरे महीने व्रत रखें। त्योहारों में मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और हनुमान जन्मोत्सव ही मनाएं। पर्व में श्राद्ध और कुंभ का पर्व जरूर मनाएं।

व्रत करने से काया निरोगी और जीवन में शांति मिलती है। सूर्य की 12 और 12 चंद्र की संक्रांति होती है। सूर्य संक्रांतियों में उत्सव का अधिक महत्व है तो चंद्र संक्रांति में व्रतों का अधिक महत्व है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन। इसमें से श्रावण मास को व्रतों में सबसे श्रेष्ठ मास माना गया है। इसके अलावा प्रत्येक माह की एकादशी, चतुर्दशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या और अधिमास में व्रतों का अलग-अलग महत्व है। सौरमास और चंद्रमास के बीच बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। साधुजन चतुर्मास अर्थात चार महीने श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह में व्रत रखते हैं।

उत्सव, पर्व और त्योहार सभी का अलग-अलग अर्थ और महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र, स्मृति, पुराण और आचार संहिता में मिलता है। चंद्र और सूर्य की संक्रांतियों अनुसार कुछ त्योहार मनाएं जाते हैं। 12 सूर्य संक्रांति होती हैं जिसमें चार प्रमुख है:- मकर, मेष, तुला और कर्क। इन चार में मकर संक्रांति महत्वपूर्ण है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ, संक्रांति और कुंभ। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी, हनुमान जयंती, नवरात्री, शिवरात्री, होली, ओणम, दीपावली, गणेशचतुर्थी और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। हालांकि सभी में मकर संक्रांति और कुंभ को सर्वोच्च माना गया है।

7.तीर्थ के बारे में :


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तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धान है। सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल, भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर और बैद्यनाथ ये द्वादश ज्योतिर्लिंग है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति उज्जैन ये सप्तपुरी। उपरोक्त कहे गए तीर्थ की यात्रा ही धर्मसम्मत है।

8.संस्कार के बारे में :

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संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।

9.पाठ करने के बारे में : 

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वेदो, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है। वक्त बदला तो लोगों ने पुराणों में उल्लेखित कथा की परंपरा शुरू कर दी, जबकि वेदपाठ और गीता पाठ का अधिक महत्व है।

10.धर्म, कर्म और सेवा के बारे में : 

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धर्म-कर्म और सेवा का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रिय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म-कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ, 5.प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।

सेव का मतलब यह कि सर्व प्रथम माता-पिता, फिर बहन-बेटी, फिर भाई-बांधु की किसी भी प्रकार से सहायता करना ही धार्मिक सेवा है। इसके बाद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना पुण्य का कार्य माना गया है। इसके अलवा सभी प्राणियों, पक्षियों, गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आति को अन्न जल देना। यह सभी यज्ञ कर्म में आते हैं।


11.दान के बारे में : 


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दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। देव आराधना का दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्‍ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है। पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है। 


12.यज्ञ के बारे में : 


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यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। अग्नि जलाकर होम करना अग्निहोत्र यज्ञ है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। यह यज्ञ पिंडदान, तर्पण और सन्तानोत्पत्ति से सम्पन्न होता है। वैश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ कहलाता है। अतितिथ यज्ञ से अर्थ मेहमानों की सेवा करना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है।


13.मंदिर जाने के बारे में :


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प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए: घर में मंदिर नहीं होना चाहिए। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए। मंदिर में जाकर परिक्रमा करना चाहिए। भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। इसी प्रदक्षिण को इस्लाम धर्म ने परंपरा से अपनाया जिसे तवाफ कहते हैं। प्रदक्षिणा षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। हिन्दू सहित जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी परिक्रमा का महत्व है। इस्लाम में मक्का स्थित काबा की 7 परिक्रमा का प्रचलन है। पूजा-पाठ, तीर्थ परिक्रमा, यज्ञादि पवित्र कर्म के दौरान बिना सिले सफेद या पीत वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्राचीनकाल से हिन्दुओं में प्रचलित रही है। मंदिर जाने या संध्यावंदन के पूर्व आचमन या शुद्धि करना जरूरी है। इसे इस्लाम में वुजू कहा जाता है।

14.संध्यावंदनके बारे में :

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संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। संध्योपासना के चार प्रकार है- 1.प्रार्थना, 2.ध्यान, 3.कीर्तन और 4.पूजा-आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।

15..धर्म की सेवा के बारे में :

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धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।

16.मंत्र के बारे में :

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वेदों में बहुत सारे मंत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन जपने के लिए सिर्फ प्रणव और गायत्री मंत्र ही कहा गया है बाकी मंत्र किसी विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यों के लिए है। वेदों में गायत्री नाम से छंद है जिसमें हजारों मंत्र है किंतु प्रथम मंत्र को ही गायत्री मंत्र माना जाता है। उक्त मंत्र के अलावा किसी अन्य मंत्र का जाप करते रहने से समय और ऊर्जा की बर्बादी है। गायत्री मंत्र की महिमा सर्वविदित है। दूसरा मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र, लेकिन उक्त मंत्र के जप और नियम कठिन है इसे किसी जानकार से पूछकर ही जपना चाहिए।

17.प्रायश्चित के बार में 

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प्राचीनकाल से ही हिन्दु्ओं में मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। प्रायश्‍चित करने के महत्व को स्मृति और पुराणों में विस्तार से समझाया गया है। गुरु और शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य को प्रायश्चित करने के अलग-अलग तरीके बताते हैं। दुष्कर्म के लिए प्रायश्चित करना , तपस्या का एक दूसरा रूप है।   यह मंदिर में देवता के समक्ष 108 बार साष्टांग प्रणाम , मंदिर के इर्दगिर्द चलते हुए साष्टांग प्रणाम और कावडी अर्थात वह तपस्या जो भगवान मुरुगन को अर्पित की जाती है, जैसे कृत्यों के माध्यम से की जाती है। मूलत: अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरूणदेव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है।

18.दीक्षा देने के बारे में :

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दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है।  दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं।

यह दीक्षा देने की परंपरा जैन धर्म में भी प्राचीनकाल से रही है, हालांकि दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। अलग-अलग धर्मों में दीक्षा देने के भिन्न-भिन्न तरीके हैं।
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Tuesday, January 15, 2019

अंग्रेजी वर्ष के अनुसार 2019 के व्रत एवं त्योहार

 अंग्रेजी वर्ष  के अनुसार 2019 के व्रत एवं त्योहार
       जनवरी 2019
1 जनवरी-   सफला एकादशीठ
3 जनवरी-   प्रदोष व्रत
4 जनवरी-   मासिक शिवरात्रि
5 जनवरी-    मार्गशीर्ष अमावस्या, पौषी अमावस्या
13 जनवरी-  लोहड़ी , गुरु गोविंद सिंह जयंती
14 जनवरी-  उत्तरायण , मकर संक्रांति
15 जनवरी-  पोंगल पर्व
17 जनवरी-   पौष पुत्रदा एकादशी
18 जनवरी-   प्रदोष व्रत
21 जनवरी-   पौषी पूर्णिमा व्रत, माघ स्नान प्रारंभ
24 जनवरी-  संकष्टी चतुर्थी
26 जनवरी-  गणतंत्र दिवस
27 जनवरी-   कालाष्टमी व्रत
31 जनवरी-   षटतिला एकादशी
        फरवरी 2019
2 फरवरी    प्रदोष व्रत , मासिक शिवरात्रि
4  फरवरी    सोमवती अमावस्या
5 फरवरी     गुप्त नवरात्रि विधान प्रारंभ
10 फरवरी    बसंत पंचमी , सरस्वती पूजा
13  फरवरी    कुम्भ संक्रांति
16  फरवरी   जया एकादशी
17  फरवरी   प्रदोष व्रत
19  फरवरी   माघ पूर्णिमा व्रत, गुरु रविदास जयंती
22  फरवरी    संकष्टी चतुर्थी
            मार्च 2019
2 मार्च     विजया एकादशी
3 मार्च     प्रदोष व्रत
4 मार्च     महाशिवरात्रि , मासिक शिवरात्रि
6 मार्च    अमावस्या
15 मार्च   मीन संक्रांति,,लट्ठमार होली (बरसाना)
17 मार्च    आमलकी एकादशी
18 मार्च    प्रदोष व्रत
20 मार्च     होलिका दहन
21 मार्च    होली , फाल्गुन पूर्णिमा व्रत
24 मार्च    संकष्टी चतुर्थी
31 मार्च    पापमोचिनी एकादशी, नोचंदी मेला( मेरठ)
         अप्रैल 2019
2 अप्रैल     प्रदोष व्रत
3 अप्रैल     मासिक शिवरात्रि, रंगतेरस
5 अप्रैल     फाल्गुन अमावस्या
6 अप्रैल     चैत्र नवरात्रि प्रारंभ , घटस्थापना, गुड़ी पड़वा
13 अप्रैल    राम नवमी,दुर्गाष्टमी
14 अप्रैल    मेष संक्रांति, वैशाखी व्रत
15 अप्रैल     कामदा एकादशी
17 अप्रैल     प्रदोष व्रत,श्री महावीर जयंती
19 अप्रैल     हनुमान जयंती , चैत्र पूर्णिमा व्रत,
22 अप्रैल     संकष्टी चतुर्थी, सबेरात
30 अप्रैल     वरुथिनी एकादशी
              मई 2019
2 मई    प्रदोष व्रत
4 मई    चैत्र अमावस्या,शनि अमावस्या
7 मई    अक्षय तृतीया, परशुराम जयंती,
11 मई   गंगा सप्तमी
15 मई   मोहिनी एकादशी , वृष संक्रांति
16 मई   प्रदोष व्रत
18 मई   वैशाख पूर्णिमा व्रत, बुद्ध जयंती
20 मई   नरद जयंती
22 मई   संकष्टी चतुर्थी
30 मई   अपरा एकादशी
31 मई   प्रदोष व्रत (कृष्ण)
              जून 2019
1 जून      मासिक शिवरात्रि
3 जून      वैशाख अमावस्या, वट सावित्री व्रत, शनि जयंती
12 जून    गंगा दशहरा
13 जून    निर्जला एकादशी
14 जून    प्रदोष व्रत
15 जून    मिथुन संक्रांति
17 जून    ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत, संत कबीर जयंती
20 जून    संकष्टी चतुर्थी
29 जून    योगिनी एकादशी
30 जून    प्रदोष व्रत (कृष्ण)
जुलाई 2019
1 जुलाई     मासिक शिवरात्रि
2 जुलाई     ज्येष्ठ अमावस्या
3 जुलाई     गुप्त नवरात्रि
4 जुलाई     जगन्नाथ रथ यात्रा
12 जुलाई     देवशयनी एकादशी, अषाढ़ी एकादशी
14 जुलाई     प्रदोष व्रत
16 जुलाई     गुरु-पूर्णिमा , आषाढ़ पूर्णिमा व्रत , कर्क संक्रांति, चंद्रग्रहण
20 जुलाई   संकष्टी चतुर्थी
28 जुलाई    कामिका एकादशी
             अगस्त 2019
1अगस्त    आषाढ़ अमावस्या, हरियाली अमावस्या
3 अगस्त    हरियाली तीज
5 अगस्त    नाग पंचमी
11 अगस्त    श्रावण पुत्रदा एकादशी
12 अगस्त    प्रदोष व्रत , ईद उल जुहा
15 अगस्त    रक्षा बंधन , श्रावण पूर्णिमा व्रत, स्वतंत्रता दिवस
17 अगस्त    सिंह संक्रांति
18 अगस्त    कजरी तीज
19 अगस्त    संकष्टी चतुर्थी
24 अगस्त    जन्माष्टमी
26 अगस्त    अजा एकादशी
28 अगस्त   मासिक शिवरात्रि , प्रदोष व्रत
30 अगस्त   श्रावण अमावस्या
                सितंबर 2019
1 सितंबर    हरतालिका तीज, गौरी तीज
2 सितंबर    गणेश चतुर्थी
9 सितंबर    परिवर्तिनी एकादशी
11 सितंबर    प्रदोष व्रत (शुक्ल) , ओणम/थिरुवोणम
12 सितंबर    अनंत चतुर्दशी
14 सितंबर    भाद्रपद पूर्णिमा व्रत, श्राद्ध
17 सितंबर    संकष्टी चतुर्थी , कन्या संक्रांति, विश्वकर्मा पूजा
25 सितंबर    इन्दिरा एकादशी
26 सितंबर   प्रदोष व्रत
27 सितंबर    मासिक शिवरात्रि
28 सितंबर    भाद्रपद अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या
29 सितंबर    शरद नवरात्रि प्रारंभ , घटस्थापना
               अक्टूबर 2019
2 अक्टूबर  गांधी जयंती
7 अक्टूबर    शरद नवरात्रि पारणा, महानवमी
8 अक्टूबर    दुर्गा विसर्जन , दशहरा
9 अक्टूबर    पापांकुशा एकादशी
13 अक्टूबर   शरद पूर्णिमा, वाल्मीकि जयंती, कोजागरी
17 अक्टूबर    संकष्टी चतुर्थी , करवा चौथ
18 अक्टूबर   तुला संक्रांति
24 अक्टूबर    रमा एकादशी
25 अक्टूबर    धनतेरस
26 अक्टूबर   नरक चतुर्दशी
27 अक्टूबर   दिवाली
28 अक्टूबर    गोवर्धन पूजा , अश्विन अमावस्या
29 अक्टूबर    भाई दूज
               नवंबर 2019
1 नवंबर    सौभाग्य पंचमी
2 नवंबर    सूर्य षष्ठी
3 नवंबर    गोपाष्टमी
5 नवंबर    अक्षय आंवला नवमी
8 नवंबर    देवोत्थान एकादशी, तुलसी विवाह
12 नवंबर   कार्तिक पूर्णिमा व्रत, गुरुनानक जयंती
16 नवंबर    संकष्टी चतुर्थी
17 नवंबर    वृश्चिक संक्रांति
22 नवंबर     उत्पन्ना एकादशी
24 नवंबर     प्रदोष व्रत (कृष्ण)
25 नवंबर     मासिक शिवरात्रि
26 नवंबर कार्तिक अमावस्या
                दिसंबर 2019
8 दिसंबर    मोक्षदा एकादशी
12 दिसंबर     मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत
15 दिसंबर     संकष्टी चतुर्थी
16 दिसंबर     धनु संक्रांति
22 दिसंबर     सफला एकादशी
26 दिसंबर     मार्गशीर्ष अमावस्या, सूर्य ग्रहण

Pramod krishna shastri
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 "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"

 प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज

     श्री धाम वृंदावन मथुरा
             उत्तर प्रदेश
संपर्क सूत्र÷8737866555
               9453316276




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