Friday, November 30, 2018

#गिरिराज_जी का_पृथ्वी_पर _आगमन_कैसे_हुआ??


 श्री गिरिराज जी का पृथ्वी पर आगमन कैसे हुआ???

🌹जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब भगवान ने गौलोक को नीचे पृथ्वी पर उतरा और गोवर्धन पर्वत ने भारतवर्ष से पश्चिमी  दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया.
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🌹एक समय मुनि श्रेष्ठ पुलस्त्य जी तीर्थ यात्रा के लिए भूतल पर भ्रमण करने लगे उन्होंने द्रोणाचल के पुत्र श्यामवर्ण वाले पर्वत गोवर्धन को देखा उन्होंने देखा कि उस पर्वत पर बड़ी शान्ति है जब उन्होंने गोवर्धन कि शोभा देखी तो उन्हें लगा कि यह तो मुमुक्षुओ के लिए मोक्ष प्रद प्रतीत हो रहा  है.

🌹मुनि उसे प्राप्त करने के लिए द्रोणाचल के समीप गए पुलस्त्य जी ने कहा - द्रोण तुम पर्वतों के स्वामी हो मै काशी का निवासी हूँ तुम अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दो काशी में साक्षात् विश्वनाथ विराजमान है मै तुम्हारे पुत्र को वहाँ स्थापित करना चाहता हूँ उसके ऊपर रहकर मै तपस्या करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी की बात सुनकर द्रोणाचल पुत्र स्नेह में रोने लगे और बोले- मै पुत्र स्नेह से आकुल हूँ फिर भी आपके  श्राप के भय से मै इसे आपको देता हूँ फिर पुत्र से बोले बेटा तुम मुनि के साथ जाओ.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुने मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन चौड़ा है ऐसी दशा में आप मुझे किस प्रकार ले चलोगे.

🌹पुलस्त्य जी ने कहा - बेटा तुम मेरे हाथ पर बैठकर चलो जब तक काशी नहीं आ जाता तब तक मै तुम्हे ढोए चलूँगा.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुनि मेरी एक प्रतिज्ञा है आप जहाँ कहि भी भूमि पर मुझे एक बार रख देगे वहाँ की भूमि से मै पुनः उत्थान नहीं करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी बोले - में इस शाल्मलद्वीप से लेकर कोसल देश तक तुम्हे कहीं नहीं रखूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है.

🌹इसके बाद पर्वत पाने पिता को प्रणाम करने मुनि की हथेली पर सवार हो गए.पुलस्त्य मुनि चलने लगे. और व्रज मंडल में आ पहुँचे गोवर्धन पर्वत को अपनी पूर्व जन्म की बातो का स्मरण था व्रज में आते ही वे सोचने लगे की यहाँ साक्षात् श्रीकृष्ण अवतार लेगे और सारी लीलाये करेगे. अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिये. यह यमुना नदी व्रज भूमि गौलोक से यहाँ आये है. और वे अपना भार बढ़ाने लगे.

🌹उस समय मुनि बहुत थक गए थे, उन्हें पहले कही गई बात याद भी नहीं रही. उन्होंने पर्वत को उतार कर व्रज मंडल में रख दिया.थके हुए थे सो जल में स्नान किया.फिर गोवर्धन से कहा - अब उठो ! अधिक भार से संपन्न होने के कारण जब वह दोनों हाथो से भी नहीं उठा. तब उन्होंने अपने तेज से और बल से उठाने का  उपक्रम किया. स्नेह से भी कहते रहे पर वह एक अंगुल भी टस के मस न हुआ.

🌹वे बोले - शीघ्र बताओ ! तुम्हारा क्या प्रयोजन है.

🌹गोवर्धन पर्वत बोला - मुनि इसमें मेरा दोष नहीं है मैंने तो आपसे पहले ही कहा था अब में यहाँ से नहीं उठुगा यह उत्तर सुनकर मुनि क्रोध में जलने लगे और उन्होंने गोवर्धन को श्राप दे दिया.

🌹पुलस्त्य जी बोले - तू बड़ा ढीठ है, इसलिए तू प्रतिदिन तिल-तिल  क्षीण होता चला जायेगा.

🌹यो कहकर पुलस्त्य जी काशी चले गए और उसी दिन से गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन तिल तिल क्षीण होते चले जा रहे है.

🌹जैसे यह गौलोक धाम में उत्सुकता पूर्वक बढने लगे थे उसी तरह यहाँ भी बढे तो वह पृथ्वी को ढक देगे यह सोचकर मुनि ने उन्हें प्रतिदिन क्षीण होने का श्राप दे दिया.

🌹जब तक इस भूतल पर भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत है, तब तक कलिकाल का प्रभाव नहीं बढ़ेगा.



      "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"
    पूज्य प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
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Tuesday, November 20, 2018

#Arjun_Ne_Bhgwahn_Krishna_se_pucha....

अर्जून ने कृष्ण से पुछा.
             "ज़हर क्या है"..?
   कृष्ण ने बहुत सुन्दर उत्तर दिया...

     "हर वो चीज़ जो ज़िन्दगी में
  ॥आवश्यकता से अधिक होती है
         वही ज़हर है

फ़िर चाहे वो ताक़तहो,
 धन हो, भूख  हो, लालच हो, 
अभिमान हो, आलस हो, मह त्वकाँक्षा हो, 
प्रेम हो या घृणा !!

              



  "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"
 प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
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Tuesday, November 13, 2018

कर्मफल का विधान

कर्मफल का विधान             

👉🏽भगवान ने नारद जी से कहा आप भ्रमण करते रहते हो कोई ऐसी घटना बताओ जिसने तम्हे असमंजस मे डाल दिया हो...

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नारद जी ने कहा प्रभु

अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।


तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, उलटे उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर उसे सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिल गई। 
थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। 
          पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया और उसे चोट लग गयी । भगवान बताइए यह कौन सा न्याय है।


भगवान मुस्कुराए, फिर बोले नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरे ही मिलीं।

वहीं उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई। इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। अब नारद जी संतुष्ट थे|


सार :


सदा अच्छे कर्म मे ही प्रवत्त रहना चाहिए 

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श्रीमद्भागवत कथा , कराने के लिये संम्पर्क करे 
      प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
    श्री धाम  वृंदावन मथुरा( उत्तर प्रदेश)
फोन 09453316276 / 08737866555

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  Jai Shree Radhe ||

Legislative Legislation *

👉🏽 God told Narad ji, you used to travel, tell an incident that has put you in confusion ...



Narada ji said Lord


Right now I am coming from a forest, where a cow was trapped in the swamps. There was no one to save him.



Only then did a thief go through, seeing the cow trapped, did not even stop, in turn reared the feet and crossed the swamp. Going forward, he found a bag full of gold pieces. After a while, an elderly sadhu passed from there. He tried his best to save the cow. With the force of the whole body saved that cow, but I saw that after the removal of cow from the swamps, the saint went ahead and fell into a pit and he got hurt. Tell God what justice it is.



God smiled, then said Narada it was right. The thief who ran away on the cow had a treasure in his destiny, but due to his sin, he got only a few pieces.


At that time the sadhu had to fall in the pit because his death had been written in the fate, but due to the saving of the cow, his virtue increased and he died in a minor injury. His destiny is determined by the deeds of man. Now Narad ji was satisfied.



abstract :



Must always remain in good deeds


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Please share the story of Shrimad Bhagwat

Pramod Krishna Shastri ji Maharaj

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Monday, November 5, 2018

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं, दीपावली इस बात का प्रतीक है

दीपावली इस बात का प्रतीक है..
                                         कि अंधेरा कितना भी घना हो महत्व प्रकाश का ही होता है 
                           जिस तरह छोटी-छोटी दिए मिलकर अमावस्या की रात को भी रोशन कर देते हैं उसी तरह छोटे-छोटे प्रयास से ही बड़े बड़े लक्ष्य प्राप्त होते हैं
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संसार में सबसे प्रकाशमय वस्तु ज्ञान है 
जिससे हमें प्रकाश का महत्व ज्ञात होता है
और मन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं इसलिए इस                दीपावली पर ज्ञान का               प्रकाश फैलाने का संकल्प लें !
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भगवान का चरणामृत पीने के बाद सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए क्यों???भगवान के चरणामृत का महत्व???

भगवान का चरणामृत पीने के बाद सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए क्यों???भगवान के चरणामृत का  महत्व???


अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,
                 क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है,

❋━━► शास्त्रों में कहा गया है

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।

"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।
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जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है.

❋━━► जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए !
                      तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के सात अतल वितल सुतल तलाताल महातल रसातल पाताल लोक नाप लिए और दूसरे पैर में ऊपर के सात भू भुवः स्वः मह जन तप और सत्य   नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,
             वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी .

जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है -
*चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी*

धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है।
चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

☝कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

                       चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

       आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

❋━━► इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।
❋━━► तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए ।
❋━━► ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

                         इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

    इसीलिए *चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये !

❋━━► लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं.?

                दरअसल शास्त्रों के अनुसार *चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।*

                 कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।

इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए ।
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Sunday, November 4, 2018

धनतेरस के दिन इस प्रकार करें पूजन" लक्ष्मी जी करेंगी धन की बरसात" धनतेरस पूजन के लिए" शुभ मुहूर्त "जानिए ???

धनतेरस के दिन इस प्रकार करें पूजन" लक्ष्मी जी करेंगी धन की बरसात"
धनतेरस पूजन के लिए" शुभ मुहूर्त "जानिए ???

धनतेरस पूजन विधि
( घर में धन धान्य वृद्धि और सुख शांति के लिए )

दिवाली से पहले धनतेरस पर पूजा का विशेष महत्व होता है. इस दिन धन और आरोग्य के लिए भगवान धन्वंतरि- भगवान महामृत्युंजय शिव और लक्ष्मी की पूजा की जाती है, साथ में धन को कमाने और उसके सदुपयोग की सद्बुद्धि के लिए          गायत्री और गणेश के मन्त्रों से पूजा की जाती है।
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  "प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज"
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1- गुरु आवाहन मंत्र - ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुरेव महेश्वरः । गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।

2 - गणेश आवाहन मन्त्र - ॐ एक दन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दंती प्रचोदयात ।।

3- लक्ष्मी आवाहन मंत्र - ॐ महा लक्ष्म्यै विद्महे, विष्णु प्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।

४ -दीपदान मंत्र ( कम से कम 5 या 11 या 21 घी के दीपकों को प्रज्वल्लित करें )-

ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्नी: स्वाहा । सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा । अग्निर्वर्च्चो ज्योतिर्वर्च्चो स्वाहा । सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वर्च्च: स्वाहा । ज्योतिः सूर्य्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ।।

5 - चौबीस(२४) बार गायत्री मंत्र का जप करें - ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् , भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ।

6- तीन बार महामृत्युंजय मंत्र का जप करें -  ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

7 - तीन बार लक्ष्मी गायत्री मंत्र का जप करें -  ॐ महा लक्ष्म्यै विद्महे, विष्णु प्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॥

8 - तीन बार गणेश मंत्र का जप करें - ॐ एक दन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दंती प्रचोदयात् ॥

9 - तीन बार कुबेर का मंत्र जप करें -  .ॐ यक्ष राजाय विद्महे, वैश्रवणाय धीमहि, तन्नो कुबेराय प्रचोदयात्॥

10-  तीन बार आरोग्य देवता धन्वन्तरि गायत्री मन्त्र का जप करें-  ॐ तत् पुरुषाय विद्महे, अमृत कलश हस्ताय धीमहि, तन्नो धन्वन्तरि  प्रचोदयात्

11 - शान्तिपाठ - ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।

दीपक नकारात्मकता का शमन कर सकारात्मक दैवीय शक्तियों को घर में प्रवेश देता है। इसलिए दीपक की जगह विद्युत् से जलने वाली led या किसी भी प्रकार की लाईट नहीं ले सकती। घर के मुख्य् द्वार पर दो घी या सरसों या तिल के तेल के रुई बाती वाले दीपक, एक तुलसी के पास, एक रसोईं में और एक बड़ा मुख्य् दीपक सूर्यास्त के बाद जलाकर रख दें। फिर कलश स्थापना कर पूजन करें। दीपयज्ञ/दीपदान के बाद घर की तिज़ोरी/लेपटॉप/बैंक की पासबुक इत्यादि का पूजन अवश्य करें।

  धनतेरस की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त
 शाम 06:37 से लेकर 08:31 तक रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में श्री गणेश लक्ष्मी का पूजन करने से धन, स्वास्थ्य और आयु बढ़ती है।

Optional - घर में बना हलवा या खीर प्रसाद में चढ़ाएं। यदि बजट है तो चांदी या स्वर्ण का आभूषण ख़रीद ले शाम 6:30 से पहले, उसे दूध में नहला के पूजन स्थल में साफ़ स्टील की कटोरी में लाल वस्त्र के ऊपर रख लें। उसका तिलक चन्दन कर पूजन के पश्चात् तिज़ोरी में रख दें, दीपावली के दिन पुनः उसका पूजन होगा।
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Thursday, November 1, 2018

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि


जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि


दृष्टिकोण

 एक महिला रोज मंदिर जाती थी ! एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नही आया करूँगी! इस पर पुजारी ने पूछा -- क्यों ?
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 तब महिला बोली -- मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं !
                      कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है ! कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं!

 इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा -- सही है ! परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं! महिला बोली -आप बताइए क्या करना है?

 पुजारी ने कहा -- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए । शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नहीं चाहिये! महिला बोली -- मैं ऐसा कर सकती हूँ!

 फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा ही कर दिखाया! उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे -

 1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा?

 2.क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा?

 3.क्या किसी को पाखंड करते देखा?

 महिला बोली -- नहीं मैंने कुछ भी नहीं देखा!

 फिर पुजारी बोले --- जब आप परिक्रमा लगा रही थीं तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नहीं दिया।

 अब जब भी आप मंदिर आयें तो अपना ध्यान सिर्फ़ परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा| सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें।
इसी बात को पूजा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं
श्रीरामचरितमानस के अंतर्गत


चौपाई..
'' जाकी रही भावना जैसी..
                 प्रभु मूरत देखी तिन तैसी !!
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