Sunday, August 25, 2019

पथ प्रदर्शक श्रीमद्भागवद गीता उपदेश एक बार अवश्य पढ़ें

   
                     ।। श्लोक ।।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥


भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। अत: तू फल की इच्‍छा किए बिना कर्म किए जा। तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
इसका अर्थ है कि मनुष्‍य को भविष्‍य की चिंता किए बिना वर्तमान में रहते हुए सिर्फ अपने काम पर फोकस करना चाहिए। अगर हम वर्तमान में मेहनत और लगन से काम करेंगे तो भविष्‍य में उसका सुफल ही प्राप्‍त होगा।


               ।। श्लोक ।।


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥


भावार्थ: ऐसा मनुष्‍य जो न कभी अति हर्षित होता है, न द्वेष करता है और न शोक करता है। और जो न कामना करता है तथा शुभ और अशुभ सम्‍पूर्ण कर्मों का त्‍यागी है। वह भक्तियुक्‍त मनुष्‍य मुझे अतिप्रिय है।
इसका अर्थ कोई अति विशिष्‍ट कार्य बन जाने पर हमें अति हर्षित होने से बचना चाहिए। ऐसा करने से गलती होने की आशंका बढ़ जाती है। हमें किसी दूसरे से जलन भी नहीं करनी चाहिए।
        


                        ।। श्लोक ।।


कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। 
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥


भावार्थ: जो मंद बुद्धि मनुष्‍य समस्‍त इंन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोकता है। मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्‍याचारी अर्थात दंभी कहा जाता है।
इसका अर्थ है कि ऐसा व्‍यक्ति जो अपनी इंद्रियों पर केवल ऊपर से नियंत्रण करने का दिखावा करता है और अंदर से उसका मन चलायमान रहता है, ऐसा व्‍यक्ति झूठा और कपटी कहलाता है।



Friday, August 23, 2019

कृष्ण जन्माष्टमी 2019 भए प्रगट कृपाला

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी॥
  • भए प्रगट कृपाला – कृपालु प्रभु प्रकट हुए
  • दीनदयाला – दीनों पर दयाकरने वाले
  • कौसल्या हितकारी – कौसल्याजी के हितकारी
  • हरषित महतारी – माता हर्ष से भर गई
  • मुनि मन हारी – मुनियों के मन को हरने वाले
  • अद्भुत रूप बिचारी – उनके अद्भुत रूप का विचार करके
जब कृपा के सागर, कौशल्या के हितकारी, दीनदयालु प्रभु प्रकट हुए, तब उनका अद्भुत स्वरुप देखकर माता कौशल्या परम प्रसन्न हुई।
जिन की शोभा को देखकर मुनि लोगों के मन मोहित हो जाते हैं, उस स्वरूप का दर्शन कर माता हर्ष से भर गई।
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लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी॥
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Pramod Krishna Shastri call 8737866555



  • लोचन अभिरामा – नेत्रों को आनंद देने वाले
  • तनु घनस्यामा – मेघ के समान श्याम शरीर
  • निज आयुध भुजचारी – चारों भुजाओं में शस्त्र (आयुध) धारण किए हुए थे
  • भूषन – दिव्य आभूषण और
  • बनमाला – वनमाला पहने हुए थे,
  • नयन बिसाला – बड़े-बड़े नेत्र थे,
  • सोभासिंधु – इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा
  • खरारी – खर राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए।
कैसा है यह स्वरूप, तुलसीदासजी कहते हैं कि सुंदर नेत्र है, मेघसा श्याम शरीर है, चारों भुजाओं में अपने चारों शस्त्र (शंख, चक्र, गदा, पद्म) धरे है।
वनमाला पहने हैं, सब अंगों में आभूषण सजे है, बड़े विशाल नेत्र है, शोभा के सागर और खर नाम राक्षस के बैरी है।
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कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता॥
  • कह दुइ कर जोरी – दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी
  • अस्तुति तोरी – तुम्हारी स्तुति
  • केहि बिधि करूं – मैं किस प्रकार करूँ
  • अनंता – हे अनंत!
  • माया गुन ग्यानातीत अमाना – माया, गुण और ज्ञान से परे
  • वेद पुरान भनंता – वेद और पुराण तुम को बतलाते हैं (वेद और पुराण तुम को माया, गुण और ज्ञान से परे बतलाते हैं)
दोनों हाथ जोड़ कौशल्या ने कहा कि हे अनंत प्रभु, मैं आप की स्तुति कैसे करू।
क्योंकि वेद और पुराण भी ऐसे कहते हैं कि प्रभु का स्वरूप माया के गुणों से परे, इंद्रियजन्य ज्ञान से अगोचर और प्रमाण का विषय नहीं है।
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करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता॥
  • करुना सुख सागर – दया और सुख का समुद्र,
  • सब गुन आगर – सब गुणों का धाम कहकर
  • जेहि गावहिं श्रुति संता – श्रुतियाँ और संतजन जिनका गान करते हैं
  • सो मम हित लागी – मेरे कल्याण के लिए
  • जन अनुरागी – वही भक्तों पर प्रेम करने वाले
  • भयउ प्रगट श्रीकंता – लक्ष्मीपति भगवान प्रकट हुए हैं
सो हे प्रभु मैं तो ऐसे जानती हूँ कि जिसे श्रुति और संत लोग गाते हैं, वे करुणा व सुखके सागर, सब गुणों के आगर (भण्डार), भक्त अनुरागी, लक्ष्मीपति, प्रभु मेरा हित करने के लिए प्रकट हुए है।
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ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै॥
  • ब्रह्मांड निकाया – अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह हैं
  • निर्मित माया – माया के रचे हुए
  • रोम रोम – आपके रोम-रोम में रहते हैं
  • प्रति बेद कहै – ऐसा वेद कहते हैं
  • मम उर सो बासी – वे तुम मेरे गर्भ में रहे
  • यह उपहासी – इस हँसी की बात
  • सुनत धीर – सुनने पर धीर (विवेकी) पुरुषों की बुद्धि भी
  • मति थिर न रहै – स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)
और हे प्रभु, वेद ऐसे कहते हैं कि आपके रोम-रोम में माया से रचे हुए अनेक ब्रह्मांड समूह रहते हैं सो वे आप मेरे उदर (गर्भ) में कैसे रहे। इस बात की मुझे बड़ी हंसी आती है।
केवल मैं ही नहीं बड़े-बड़े धीर पुरुषों की बुद्धि भी यह बात सुनकर धीर नहीं रहती।
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उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥
  • उपजा जब ग्याना – जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ
  • प्रभु मुसुकाना – तब प्रभु मुस्कुराए
  • चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै – वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं
  • कहि कथा सुहाई – अतः उन्होंने (पूर्व जन्म की) सुंदर कथा कहकर
  • मातु बुझाई – माता को समझाया
  • जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै – जिससे उन्हें पुत्र का प्रेम प्राप्त हो और भगवान के प्रति पुत्र का भाव आ जाए
जब कौशल्या को ज्ञान प्राप्त हो गया तब प्रभु हँसे कि देखो इसको किस वक्त में ज्ञान प्राप्त हुआ है अभी इसको ज्ञान नहीं होना चाहिए। क्योंकि, अभी मुझको बहुत चरित्र करने हैं।
उस वक्त प्रभु अनेक प्रकार के चरित्र करना चाहते थे, इसलिए माता को अनेक प्रकार की कथा सुना कर ऐसे समझा बुझा दिया कि जिस तरह उसके मन में पुत्र का प्रेम आ गया।
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माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा॥
  • माता पुनि बोली, सो मति डोली– प्रभु की प्रेरणा से कौशल्या माँ की बुद्धि दूसरी ओर डोल गई, तब वह फिर बोली
  • तजहु तात यह रूपा – हे तात! यह रूप छोड़कर
  • कीजै सिसुलीला – बाललीला करो
  • अति प्रियसीला – जो मेरे लिए अत्यन्त प्रिय है
  • यह सुख परम अनूपा – यह सुख मेरे लिए परम अनुपम होगा
प्रभु की प्रेरणा से कौशल्या की बुद्धि दूसरी ओर डोल गई जिससे वह फिर बोली कि हे तात! आप यह स्वरूप तज (छोड़) दो।
बालक स्वरूप धारण कर, अतिशय प्रिय स्वभाव वाली बाल लीला करो। यह सुख मुझको बहुत अच्छा लगता है।
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सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा॥
  • सुनि बचन सुजाना – माता के ऐसे वचन सुनकर
  • रोदन ठाना – (भगवान ने बालक रूप धारण कर) रोना शुरू कर दिया
  • होइ बालक – बालक रूप धारण कर
  • सुरभूपा – देवताओं के स्वामी भगवान ने
  • यह चरित जे गावहिं – जो इस चरित्र का गान करते हैं
  • हरिपद पावहिं – वे श्री हरि का पद (भगवत पद) पाते हैं
  • ते न परहिं – और वे फिर नहीं गिरते
  • भवकूपा – संसार रूपी कुएं में (और फिर संसार रूपी माया में नहीं गिरते)
माता के ऐसे वचन सुन प्रभु ने बालक स्वरूप धारण कर रुदन करना (रोना) शुरू किया।

महादेव जी कहते हैं कि हे पार्वती जो मनुष्य इस चरित्र को गाते हैंवह मनुष्य अवश्य भगवत पदको प्राप्त हो जाते हैं और वे कभी संसार रुपी कुए में नहीं गिरते।

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता॥

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै॥

उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥

माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा॥

सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा॥

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी॥

Thursday, July 25, 2019

Pramod Krishna shastri Bhagwat katha

  जिस दिन आप का विचार हो जाएगा
कि भगवान के बिना मैं रह नहीं सकता,

Pramod Krishna Shastri
Call 8737866555

एक मच्छर गरुड़जी से मिलना चाहे और गरुड़ जी मच्छर से मिलना चाहे तो मच्छर से मिलने में गरुड़ की ताकत काम करेगी और वे यहीं उसे मिल जाएंगे। मच्छर में उड़ने की कितनी ताकत है ?  

  इसी तरह भगवान से मिलने की इच्छा हो तो आप से मिलने में भगवान की ताकत काम करेगी आपकी ताकत काम नहीं करेगी

आप विचार करो, आप भगवान के पास नहीं पहुंच सकते तो क्या भगवान भी आपके पास नहीं पहुंच सकते??
 वे तो आपके हृदय में विराजमान हैं।  भगवान को आप दूर मानते हो इसलिए भगवान दूर होते हैं। आप मानोगे कि भगवान मेरे को नहीं मिलेंगे तो वह नहीं मिलेंगे।

Thursday, June 20, 2019

21 June yoga



आओ हम सब मिलकर योग दिवस मनायें,गांव-गांव और शहर-शहर में, इसकी अलख जगायें


PRAMOD KRISHNA SHASTRI
Call 8737866555

Sunday, June 9, 2019

!! भगवान् का दंड !!


गया जी के आकाशगंगा पहाड़ पर एक परमहंस जी वास करते थे।

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एक दिन परमहंस जी के शिष्य ने एकादशी के दिन निर्जला उपवास करके द्वादशी के दिन प्रातः उठकर फल्गु नदी में स्नान किया, 
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विष्णुपद का दर्शन करने में उन्हें थोड़ा विलम्ब हो गया। वे साथ में एक गोपाल जी को सर्वदा ही रखते थे। 
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द्वादशी के पारण का समय बीतता जा रहा था, देखकर वे अधीर हो गये एवं शीघ्र एक हलवाई की दुकान में जाकर उन्होंने दुकानदार से कहा..
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पारण का समय निकला जा रहा है, मुझे कुछ मिठाई दे दो, गोपाल जी को भोग लगाकर मैं थोड़ा जल ग्रहण करुँगा।        
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दुकानदार उनकी बात अनसुनी कर दी। 
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साधु के तीन - चार बार माँगने पर भी हाँ ना कुछ भी उत्तर नहीं मिलने से व्यग्र होकर एक बताशा लेने के लिए जैसे ही उन्होने हाथ बढ़ाया, दुकानदार और उसके पुत्र ने साधु की खुब पिटाई की, 
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निर्जला उपवास के कारण साधु दुर्बल थे, इस प्रकार के प्रहार से वे सीधे गिर पड़े। 
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रास्ते के लोगों ने बहुत प्रयास करके साधु की रक्षा की। 
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साधु ने दुकानदार से एक शब्द भी नहीं कहा, ऊपर की ओर देखकर थोड़ा हँसते हुए प्रणाम करके कहा-भली रे दयालु गुरुजी, तेरी लीला। 
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केवल इतना कहकर साधु पहाड़ की ओर चले गये।
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गुरुदेव परमहंस जी पहाड़ पर ध्यानमग्न बैठे हुए थे, एकाएक चौक उठे एवं चट्टान से नीचे कूदकर बड़ी तीव्र गति से गोदावरी नामक रास्ते की ओर चलने लगे। 
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रास्ते में शिष्य को देखकर परमहंस जी कहा 'क्यो रे बच्चा, क्या किया ? 

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शिष्य ने कहा, गुरुदेव मैने तो कुछ नहीं किया। 
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परमहंस जी ने कहा, बहुत किया। तुमने बहुत बुरा काम किया। 
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रामजी के ऊपर बिल्कुल छोड़ दिया। 
Pramod Krishna Shastri

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जाकर देखो, रामजी ने उसका कैसा हाल किया। यह कहकर शिष्य को लेकर परमहंस जी हलवाई की दुकान के पास जा पहुँचे। 
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उन्होंने देखा हलवाई का सर्वनाश हो गया है।
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साधु को पीटने के बाद, जलाने की लकड़ी लाने के लिए हलवाई का लड़का जैसे ही कोठरी में घुसा था उसी समय एक काले नाग ने उसे डस लिया। 
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हलवाई घी गर्म कर रहा था, सर्पदंश से मृत अपने पुत्र को देखने दौड़ा। उधर चूल्हे पर रखे घी के जलने से दुकान की फूस की छत पर आग लग गई।
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परमहंस जी ने देखा, लड़का रास्ते पर मृतवत पड़ा है, दुकान धू-धू करके जल रही है, रास्ते के लोग हाहाकार कर रहे है। भयानक दृश्य था। 
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परमहंस जी शिष्य को लेकर पहाड़ पर आ गए। शिष्य को खूब फटकारते हुए कहा कि बिना अपराध के कोई अत्याचार करता है, 
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तो क्रोध न आने पर भी साधु पुरुष को कम-से-कम एक गाली ही देकर आना चाहिए। 
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साधु के थोड़ा भी प्रतिकार करने से अत्याचारी की रक्षा हो जाती है, परमात्मा के ऊपर सब भार छोड़ देने से परमात्मा बहुत कठोर दंड देते हैं। 
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भगवान् का दंड बड़ा भयानक होता है।


  जय जय श्री राधे 

Thursday, May 9, 2019

Bhakt aur Bhgwan katha

  ।। सदना कसाई की कथा ।।

काशी में एक ब्राह्मण के सामने से एक गाय भागती हुई किसी गली में घुस गई। तभी वहां एक आदमी आया उसने गाय के बारे में पूछा -

पंडितजी माला फेर रहे थे इसलिए कुछ बोला नहीं बस हाथ से उस गली का इशारा कर दिया जिधर गाय गई थी ।

पंडितजी इस बात से अंजान थे कि वह आदमी कसाई है, और गौमाता उसके चंगुल से जान बचाकर भागी थीं। कसाई ने पकड़कर गोवध कर दिया।
अंजाने में हुए इस घोर पाप के कारण पंडितजी अगले जन्म में कसाई घर में जन्मे नाम पड़ा, सदना।पर पूर्वजन्म के पुण्यकर्मो के कारण कसाई होकर भी वह उदार और सदाचारी थे।
कसाई परिवार में जन्मे होने के कारण सदना मांस बेचते तो थे, परन्तु भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी एक दिन सदना को नदी के किनारे एक पत्थर पड़ा मिला।
पत्थर अच्छा लगा इसलिए वह उसे मांस तोलने के लिए अपने साथ ले आए।वह इस बात से अंजान थे कि यह वही शालिग्राम थे जिन्हें पूर्वजन्म नित्य पूजते थे ।
सदना कसाई पूर्वजन्म के शालिग्राम को इस जन्म में मांस तोलने के लिए बाँट ( तोल) के रूप में प्रयोग करने लगे।आदत के अनुसार सदना ठाकुरजी के भजन गाते रहते थे।
ठाकुरजी भक्त की स्तुति का पलड़े में झूलते हुए आनंद लेते रहते।बाँट का कमाल ऐसा था कि चाहे आधा किलो तोलना हो, एक किलो या दो किलो सारा वजन उससे पक्का हो जाता।
एक दिन सदना की दुकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले, उनकी नजर बाँट पर पड़ी तो सदना के पास आए और शालिग्राम को अपवित्र करने के लिए फटकारा।
उन्होंने कहा- मूर्ख, जिसे पत्थर समझकर मांस तौल रहे हो वे शालिग्राम भगवान हैं। ब्राह्मण ने सदना से शालिग्राम भगवान को लिया और घर ले आए।
गंगा जल से नहलाया, धूप, दीप,चन्दन से पूजा की। ब्राह्मण को अहंकार हो गया जिस शालिग्राम से पतितों का उद्दार होता है आज एक शालिग्राम का वह उद्धार कर रहा है।
रात को उसके सपने में ठाकुरजी आए और बोले- तुम जहां से लाए हो वहीँ मुझे छोड़ आओ, मेरे भक्त सदन कसाई की भक्ति में जो बात है वह तुम्हारे आडंबर में नहीं।
ब्राह्मण बोला- प्रभु! सदना कसाई का पापकर्म करता है, आपका प्रयोग मांस तोलने में करता है। मांस की दुकान जैसा अपवित्र स्थान आपके योग्य नहीं
भगवान बोले- भक्ति में भरकर सदना मुझे तराजू में रखकर तोलता था मुझे ऐसा लगता है कि वह मुझे झूला रहा हो। मांस की दुकान में आने वालों को भी मेरे नाम का स्मरण कराता है।
मेरा भजन करता है, जो आनन्द वहां मिलता था वह यहां नहीं, तुम मुझे वही छोड आओ। ब्राह्मण शालिग्राम भगवान को वापस सदना कसाई को दे आए।
ब्राह्मण बोला- भगवान को तुम्हारी संगति ही ज्यादा सुहाई। यह तो तुम्हारे पास ही रहना चाहते हैं। ये शालिग्राम भगवान का स्वरुप हैं, हो सके तो इन्हें पूजना बाट मत बनाना।
सदना ने यह सुना अनजाने में हुए अपराध को याद करके दुखी हो गया। सदना ने प्राश्चित का निश्चय किया और भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए निकल पड़ा।
वह भी भगवान के दर्शन को जाते एक समूह में शामिल हो गए लेकिन लोगों को पूछने पर उसने बता दिया कि वह कसाई का काम करता था।
लोग उससे दूर-दूर रहने लगे। उसका छुआ खाते-पीते नहीं थे। दुखी सदना ने उनका साथ छोड़ा और शालिग्रामजी के साथ भजन करता अकेले चलने लगा।
सदना को प्यास लगी थी,रास्ते में एक गांव में कुंआ दिखा तो वह पानी पीने ठहर गया। वहां एक सुन्दर स्त्री पानी भर रही थी।वह सदना के सुंदर मजबूत शरीर पर रीझ गई।
उसने सदना से कहा कि शाम हो गई है, इसलिए आज रात वह उसके घर में ही विश्राम कर लें,सदना को उसकी कुटिलता समझ में न आई, वह उसके अतिथि बन गए,
रात में वह स्त्री अपने पति के सो जाने पर सदना के पास पहुंच गई और उनसे अपने प्रेम की बात कही, स्त्री की बात सुनकर सदना चौंक गए और उसे पतिव्रता रहने को कहा।
स्त्री को लगा कि शायद पति होने के कारण सदना रुचि नहीं ले रहे, वह चली गई और सोते हुए पति का गला काट लाई।
सदना भयभीत हो गए,स्त्री समझ गई कि बात बिगड़ जाएगी इसलिए उसने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया। पड़ोसियों से कह दिया कि इस यात्री को घर में जगह दी थी चोरी की नीयत से इसने मेरे पति का गला काट दिया,
सदना को पकड़ कर न्यायाधीश के सामने पेश किया गया। न्यायाधीश ने सदना को देखा तो ताड़ गए कि यह हत्यारा नहीं हो सकता। उन्होने बार-बार सदना से सारी बात पूछी।
सदना को लगता था कि यदि वह प्यास से व्याकुल गांव में न पहुंचते तो हत्या न होती।वह स्वयं को ही इसके लिए दोषी मानते थे, अतः वे मौन ही रहे।
न्यायाधीश ने राजा को बताया कि एक आदमी अपराधी है नहीं पर चुप रहकर एक तरह से अपराध की मौन स्वीकृति दे रहा है। इसे क्या दंड दिया जाना चाहिए?
राजा ने कहा- यदि वह प्रतिवाद नहीं करता तो दण्ड अनिवार्य है, अन्यथा प्रजा में गलत सन्देश जाएगा कि अपराधी को दंड नहीं मिला।इसे मृत्युदंड मत दो, हाथ काटने का
हुक्म दो।
सदना का दायां हाथ काट दिया गया, सदना ने अपने पूर्वजन्म के कर्म मानकर चुपचाप दंड सहा और जगन्नाथपुरी धाम की यात्रा शुरू की।
धाम के निकट पहुंचे तो भगवान ने अपने सेवक राजा को प्रियभक्त सदना कसाई की सम्मान से अगवानी का आदेश दिया। प्रभु आज्ञा से राजा गाजे-बाजे लेकर अगुवानी को आया।
सदना ने यह सम्मान स्वीकार नहीं किया तो स्वयं ठाकुरजी ने दर्शन दिए। उन्हें सारी बात सुनाई- तुम पूर्वजन्म में ब्राहमण थे, तुमने संकेत से एक कसाई को गाय का पता बताया था।
तुम्हारे कारण जिस गाय की जान गई थी वही स्त्री बनी है जिसके झूठे आरोपों से तुम्हारा हाथ काटा गया। उस स्त्री का पति पूर्वजन्म का कसाई बना था जिसका वध कर गाय ने बदला लिया है।

भगवान जगन्नाथजी बोले- सभी के शुभ और अशुभ कर्मों का फल मैं देता हूँ ।अब तुम निष्पाप हो गए हो।घृणित आजीविका के बावजूद भी तुमने धर्म का साथ न छोड़ा

इसलिए तुम्हारे प्रेम को मैंने स्वीकार किया।
मैं तुम्हारे साथ मांस तोलने वाले तराजू में भी प्रसन्न रहा।भगवान के दर्शन से सदनाजी को मोक्ष प्राप्त हुआ।
              जय जय श्री राधे राधे जी आप सभी को

Monday, May 6, 2019

Bhagwat Geeta Gyan

"गीता-दर्पण" से लिया गया ।

 प्रश्न:-जिसके पाप बहुत हैं ,वह भगवान् का नाम नहीं ले सकता;अतः
वह क्या करे?

  उत्तर:-- बात सच्ची है । जिसके अधिक पाप होते हैं, वह भगवान् का 

नाम नहीं ले सकता ।      

#श्लोक           
 ।। वैष्णवे भगवद्भक्तौ प्रसादे हरिनाम्नि च।
          अल्पपुण्यवतां श्रद्धा यथावन्नैव जायते ।।


      अर्थात जिसका पुण्य थोड़ा होता है, उसकी भक्तोंमें, भक्तिमें,           भगवत्प्रसादमें और भगवन्नाममें श्रद्धा
नहीं होती ।
                  जैसे पित्तका जोर होनेपर
रोगी को मिश्री भी कड़वी लगती है ।
परन्तु यदि वह मिश्रीका सेवन करता
रहे तो पित्त शान्त हो जाता है और मिश्री मीठी लगने लग जाती है ।
  ऐसे ही पाप अधिक होनेसे नाम अच्छा नहीं लगता; परन्तु नामजप
करना शुरू कर दें तो पाप नष्ट हो जायँगे और नाम अच्छा, मीठा लगने लग जायगा तथा नामजपका प्रत्यक्ष
लाभ भी  दीखने लग जायगा ।


       " गीता दर्पण "

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