Sunday, December 9, 2018

#संसार_में_चार_प्रकार_के_भक्त_होते_हैं

संसार में चार प्रकार के भक्त हैं:---------

जिज्ञासु, आर्त, अथार्थी और ज्ञानी |
जिज्ञासु---- ब्रह्म की रचना एवं इसके संचालन के रहस्य को जाना चाहते  हैं | राम-नाम के अभ्यास से इनका आंतरिक विकास हो जाता है जिसके द्वारा इनको ब्रह्म के रहस्य की जानकारी हो जाती है | वे स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत की जानकारी हासिल करके ब्रह्म के प्रपंच यानी माया के खेल को समझ लेते हैं |
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              इस ज्ञान के कारण ये संसार से विरक्त हो जाते हैं और ब्रह्म से इनका अनुराग पैदा हो जाता है | वे संसार के बीच रहते हुए भी अनुपम सुख का अनुभव करते हैं |

आर्त---- वे हैं जो सांसारिक विपत्ति से पीड़ित या घबराकर राम- नाम के भजन में लगते हैं | उन पर भी परमात्मा की कृपा होती है और उनकी दुःख और पीड़ा ख़त्म हो जाती है |


अर्थार्थी------ वो हैं जो अपनी किसी मनोकामना पूर्ण करने के लिए प्रभु की भक्ति करते हैं | राम-नाम के अभ्यास से उनकी ,मनोकामना पूरी हो जाती है पर वो फिर भी चौरासी के कैदी ही रहते हैं | इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है | ये तो अंधे कुएं के सामान है, एक पूरी हो तो दस खडी हो जाती हैं |


ज्ञानी---- वो हैं जिनके अन्दर संसार की कोई कामना नहीं होती है | वे सच्चे परमार्थी ज्ञान की प्राप्ति करके मोक्ष पाना चाहते हैं | ऐसे भक्तजन भी राम-नाम के अभ्यास से गूढ़ परमार्थी ज्ञान को प्राप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं | चारों प्रकार के भक्तों को राम-नाम के अभ्यास द्वारा मनवांछित फल प्राप्त हो जाता है |
                   तुलसीदास जी महाराज समझाते हैं कि इन सब भक्तों में ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष प्रिय होते हैं, क्योंकि उनके अन्दर कोई सांसारिक कामना नहीं होती | वे भक्ति द्वारा अपने परमपिता का ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं | इसी लिए प्रभु के प्यारे होते हैं | जो भक्त सभी सांसारिक कामनाओं को छोड़ कर केवल प्रेम और भक्ति के वश में होकर राम-नाम का अभ्यास करता है, उसका मछली रूपी मन मानों राम-नाम रूपी अमृत-कुंद में निवास करता है | आत्मा शरीर के आवरणों मन के बन्धनों से मुक्त होकर राम-नाम रूपी मानसरोवर में प्रवेश करती है |
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी | बिरती बिरंची प्रपंच बियोगी ||
ब्रह्मसुखहिं अनुभवहिं अनूपा | अकथ अनामय नाम न रूपा ||
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ | नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ ||
साधक नाम जपहिं लाएँ | होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ ||
जपहिं नाम जन आरत भारी | मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ||
राम भगत जग चारि प्रकारा | सुकृति चारिउ अनघ उतारा ||
चहु चतुर कहूँ नाम अधारा | ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा ||
चहुँ जग चहुँ श्रुति नाम प्रभाउ | कलि बिसेषी नहीं आन उपाउ ||
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीं |
नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्ह्हूँ किए मन मीन ||

!! राधे राधे !!

#which_stone_is_preferable_according_to_your_stars


राशि के अनुसार कौन सा रत्न धारण करना चाहिए??? 

Pramod Krishna Shastri Ji Maharaj is a renowned national-level Bhagwat Katha speaker. He speaks about astrology, Hinduism, Hindu philosophy, and everything related to Hindu religion.
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Monday, December 3, 2018

जीवन में कितना भी दुख आए, परमात्मा को कभी मत छोड़िए

जीवन में कैसा भी दुःख और कष्ट परेशानी आये पर भक्ति भजन करना कभी भी मत छोड़िए ।
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क्या कष्ट आता है तो आप भोजन करना छोड़ देते है?

क्या बीमारी आती है तो आप सांस लेना छोड देते हैं?

नही ना,फिर जरा सी तकलीफ़ आने पर आप भक्ति करना क्यों छोड़ देते हो ?

कभी भी दो चीज मत छोड़िए

"भजन और भोजन ""
भोजन छोड़ दोगे तो ज़िंदा नही रहोगे।

भजन छोड़ दोगे तो कहीं के नहीं रहोगे।

सही दृष्टि से देखा जाए तो भजन ही भोजन है।


PRAMOD KRISHNAN SHASTRI

Friday, November 30, 2018

#गिरिराज_जी का_पृथ्वी_पर _आगमन_कैसे_हुआ??


 श्री गिरिराज जी का पृथ्वी पर आगमन कैसे हुआ???

🌹जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब भगवान ने गौलोक को नीचे पृथ्वी पर उतरा और गोवर्धन पर्वत ने भारतवर्ष से पश्चिमी  दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया.
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🌹एक समय मुनि श्रेष्ठ पुलस्त्य जी तीर्थ यात्रा के लिए भूतल पर भ्रमण करने लगे उन्होंने द्रोणाचल के पुत्र श्यामवर्ण वाले पर्वत गोवर्धन को देखा उन्होंने देखा कि उस पर्वत पर बड़ी शान्ति है जब उन्होंने गोवर्धन कि शोभा देखी तो उन्हें लगा कि यह तो मुमुक्षुओ के लिए मोक्ष प्रद प्रतीत हो रहा  है.

🌹मुनि उसे प्राप्त करने के लिए द्रोणाचल के समीप गए पुलस्त्य जी ने कहा - द्रोण तुम पर्वतों के स्वामी हो मै काशी का निवासी हूँ तुम अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दो काशी में साक्षात् विश्वनाथ विराजमान है मै तुम्हारे पुत्र को वहाँ स्थापित करना चाहता हूँ उसके ऊपर रहकर मै तपस्या करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी की बात सुनकर द्रोणाचल पुत्र स्नेह में रोने लगे और बोले- मै पुत्र स्नेह से आकुल हूँ फिर भी आपके  श्राप के भय से मै इसे आपको देता हूँ फिर पुत्र से बोले बेटा तुम मुनि के साथ जाओ.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुने मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन चौड़ा है ऐसी दशा में आप मुझे किस प्रकार ले चलोगे.

🌹पुलस्त्य जी ने कहा - बेटा तुम मेरे हाथ पर बैठकर चलो जब तक काशी नहीं आ जाता तब तक मै तुम्हे ढोए चलूँगा.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुनि मेरी एक प्रतिज्ञा है आप जहाँ कहि भी भूमि पर मुझे एक बार रख देगे वहाँ की भूमि से मै पुनः उत्थान नहीं करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी बोले - में इस शाल्मलद्वीप से लेकर कोसल देश तक तुम्हे कहीं नहीं रखूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है.

🌹इसके बाद पर्वत पाने पिता को प्रणाम करने मुनि की हथेली पर सवार हो गए.पुलस्त्य मुनि चलने लगे. और व्रज मंडल में आ पहुँचे गोवर्धन पर्वत को अपनी पूर्व जन्म की बातो का स्मरण था व्रज में आते ही वे सोचने लगे की यहाँ साक्षात् श्रीकृष्ण अवतार लेगे और सारी लीलाये करेगे. अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिये. यह यमुना नदी व्रज भूमि गौलोक से यहाँ आये है. और वे अपना भार बढ़ाने लगे.

🌹उस समय मुनि बहुत थक गए थे, उन्हें पहले कही गई बात याद भी नहीं रही. उन्होंने पर्वत को उतार कर व्रज मंडल में रख दिया.थके हुए थे सो जल में स्नान किया.फिर गोवर्धन से कहा - अब उठो ! अधिक भार से संपन्न होने के कारण जब वह दोनों हाथो से भी नहीं उठा. तब उन्होंने अपने तेज से और बल से उठाने का  उपक्रम किया. स्नेह से भी कहते रहे पर वह एक अंगुल भी टस के मस न हुआ.

🌹वे बोले - शीघ्र बताओ ! तुम्हारा क्या प्रयोजन है.

🌹गोवर्धन पर्वत बोला - मुनि इसमें मेरा दोष नहीं है मैंने तो आपसे पहले ही कहा था अब में यहाँ से नहीं उठुगा यह उत्तर सुनकर मुनि क्रोध में जलने लगे और उन्होंने गोवर्धन को श्राप दे दिया.

🌹पुलस्त्य जी बोले - तू बड़ा ढीठ है, इसलिए तू प्रतिदिन तिल-तिल  क्षीण होता चला जायेगा.

🌹यो कहकर पुलस्त्य जी काशी चले गए और उसी दिन से गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन तिल तिल क्षीण होते चले जा रहे है.

🌹जैसे यह गौलोक धाम में उत्सुकता पूर्वक बढने लगे थे उसी तरह यहाँ भी बढे तो वह पृथ्वी को ढक देगे यह सोचकर मुनि ने उन्हें प्रतिदिन क्षीण होने का श्राप दे दिया.

🌹जब तक इस भूतल पर भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत है, तब तक कलिकाल का प्रभाव नहीं बढ़ेगा.



      "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"
    पूज्य प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
www.pramodkrishnashastri.com
       8737866555 9453316276

Tuesday, November 20, 2018

#Arjun_Ne_Bhgwahn_Krishna_se_pucha....

अर्जून ने कृष्ण से पुछा.
             "ज़हर क्या है"..?
   कृष्ण ने बहुत सुन्दर उत्तर दिया...

     "हर वो चीज़ जो ज़िन्दगी में
  ॥आवश्यकता से अधिक होती है
         वही ज़हर है

फ़िर चाहे वो ताक़तहो,
 धन हो, भूख  हो, लालच हो, 
अभिमान हो, आलस हो, मह त्वकाँक्षा हो, 
प्रेम हो या घृणा !!

              



  "राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता"
 प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
       08737866555

Tuesday, November 13, 2018

कर्मफल का विधान

कर्मफल का विधान             

👉🏽भगवान ने नारद जी से कहा आप भ्रमण करते रहते हो कोई ऐसी घटना बताओ जिसने तम्हे असमंजस मे डाल दिया हो...

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नारद जी ने कहा प्रभु

अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।


तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, उलटे उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर उसे सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिल गई। 
थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। 
          पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया और उसे चोट लग गयी । भगवान बताइए यह कौन सा न्याय है।


भगवान मुस्कुराए, फिर बोले नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरे ही मिलीं।

वहीं उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई। इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। अब नारद जी संतुष्ट थे|


सार :


सदा अच्छे कर्म मे ही प्रवत्त रहना चाहिए 

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श्रीमद्भागवत कथा , कराने के लिये संम्पर्क करे 
      प्रमोद कृष्ण शास्त्री जी महाराज
    श्री धाम  वृंदावन मथुरा( उत्तर प्रदेश)
फोन 09453316276 / 08737866555

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  Jai Shree Radhe ||

Legislative Legislation *

👉🏽 God told Narad ji, you used to travel, tell an incident that has put you in confusion ...



Narada ji said Lord


Right now I am coming from a forest, where a cow was trapped in the swamps. There was no one to save him.



Only then did a thief go through, seeing the cow trapped, did not even stop, in turn reared the feet and crossed the swamp. Going forward, he found a bag full of gold pieces. After a while, an elderly sadhu passed from there. He tried his best to save the cow. With the force of the whole body saved that cow, but I saw that after the removal of cow from the swamps, the saint went ahead and fell into a pit and he got hurt. Tell God what justice it is.



God smiled, then said Narada it was right. The thief who ran away on the cow had a treasure in his destiny, but due to his sin, he got only a few pieces.


At that time the sadhu had to fall in the pit because his death had been written in the fate, but due to the saving of the cow, his virtue increased and he died in a minor injury. His destiny is determined by the deeds of man. Now Narad ji was satisfied.



abstract :



Must always remain in good deeds


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Please share the story of Shrimad Bhagwat

Pramod Krishna Shastri ji Maharaj

Shri Dham Vrindavan Mathura (Uttar Pradesh)

Phone 09453316276/08737866555


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Monday, November 5, 2018

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं, दीपावली इस बात का प्रतीक है

दीपावली इस बात का प्रतीक है..
                                         कि अंधेरा कितना भी घना हो महत्व प्रकाश का ही होता है 
                           जिस तरह छोटी-छोटी दिए मिलकर अमावस्या की रात को भी रोशन कर देते हैं उसी तरह छोटे-छोटे प्रयास से ही बड़े बड़े लक्ष्य प्राप्त होते हैं
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संसार में सबसे प्रकाशमय वस्तु ज्ञान है 
जिससे हमें प्रकाश का महत्व ज्ञात होता है
और मन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं इसलिए इस                दीपावली पर ज्ञान का               प्रकाश फैलाने का संकल्प लें !
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हमारे ,आप के जीवन पर आधारित ,बहुत ही ज्ञानवर्धक कथा एक बार अवश्य पढ़ें!!


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